कोविड महामारी के समय सबसे अहम भूमिका नर्सों एवं डॉक्टरों की है

कोविड महामारी के समय सबसे अहम भूमिका नर्सों एवं डॉक्टरों की है

वाराणसी (रणभेरी): भारत एवं विश्व के कई देशों में कोविड-19 से उपजी वैश्विक महामारी से अनुमान लगाया जा सकता है कि डॉक्टर एवं सहयोगी नर्सों की मेडिकल क्षेत्र में क्या भूमिका होता है। इस संकटकाल महामारी के समय भारत में डॉक्टरों, नर्सों एवं हॉस्पिटलों की कमी बखूबी देखा गया है जिसके कमी के कारण कोई भी बीमारी भयावाह रूप लेने में समय नहीं लगता और सबसे ज्यादा जरूरी नर्स सेवा होता है। एक बार डॉक्टर की गैरमौजूदगी में भी नर्स लोग सामान्य ट्रीटमेंट कर देते हैं जिसके कारण बीमार व्यक्ति को कुछ हद तक सांत्वना मिल जाता है। आज के हालात में तो नर्स बहुत ही जिम्मेदारी से अपनी भूमिका अपने-अपने क्षेत्रों में निभा रहे हैं इसी को देखते हुए विश्व में 12 मई को अंतर्राष्ट्रीय नर्स दिवस मनाया जाता है हालांकि इस दिवस की मनाने की प्रक्रिया आधुनिक नर्सिंग की जननी ‘फ्लोरेंस नाइटिंगेल’ की याद में प्रति वर्ष 12 मई को अंतरराष्ट्रीय नर्स दिवस मनाया जाता है।

इन्होंने मरीजों और रोगियों की सेवा की प्रीमिया युद्ध के दौरान लालटेन लेकर घायल सैनिकों की दिल से सेवा की थी, जिसके कारण ही उन्हें ‘लेडी बिथ द लैम्प’ कहा गया। हालांकि मित्रों ब्रिटि‍श परिवार में 12 मई 1820 को जन्मी फ्लोरेंस नाइटिंगेल अपनी सेवा भावना के लिए याद की जाती हैं। उन्होंने 1860 में सेंट टॉमस अस्पताल और नर्सों के लिए नाइटिंगेल प्रशिक्षण स्कू‍ल की स्थापना की थी। दोस्तों विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर में अमीर और ग़रीब दोनों प्रकार के देशों में नर्सोंं की कमी चल रही है। विकसित देश अपने यहाँ नर्सोंं की कमी को अन्य देशों से नर्सोंं को बुलाकर पूरा कर लेते हैं और उनको वहाँ पर अच्छा वेतन और सुविधाएँ देते हैं, जिनके कारण वे विकसित देशों में जाने में देरी नहीं करती हैं।

जिसका एक ही कारण है उस व्यक्ति को जिस देश में वह डिग्री लिया उस देश में उस व्यक्ति को रोजगार ना देना और इसलिए वह दूसरे विकसित देशों में शिफ्ट हो जाते हैं ऐसा केवल मेडिकल क्षेत्र में ही नहीं बल्कि टेक्नोलॉजिकल इंजीनियरिंग क्षेत्र में भी लोग विदेशों में शिफ्ट होना ज्यादा पसंद करते हैं तो दोस्तों दूसरी ओर विकासशील देशों में नर्सोंं को अधिक वेतन और सुविधाओं की कमी रहती है और आगे का भविष्य भी अधिक उज्ज्वल नहीं दिखाई देता, जिसके कारण वे विकसित देशों के बुलावे पर नौकरी के लिए चली जाती हैं।

हालांकि दोस्तो रोगी और नर्स के अनुपात में अंतर देखा जाए तो दुनिया के अधिकांश देशों में आज भी प्रशिक्षित नर्सों की भारी कमी चल रही है, लेकिन विकासशील देशों में यह कमी और भी अधिक देखने को मिलती है। भारत में विदेशों के लिए नर्सों के पलायन में पहले की अपेक्षा कमी आई है, लेकिन रोगी और नर्स के अनुपात में अभी भी भारी अंतर है। ट्रेंड नर्सेस एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया की महासचिव के अनुसार सरकार द्वारा उठाए गए कदमों के कारण भारत में प्रशिक्षित नर्सों की संख्या में कुछ सुधार हुआ है। अच्छे वेतन और सुविधाओं के लिए पहले जितनी अधिक संख्या में प्रशिक्षित नर्सें विदेश जाती थीं, आज उनकी संख्या में कमी आई है। रोगियों की संख्या में लगातार वृद्धि होने के कारण रोगी और नर्स के अनुपात में अंतर बढ़ा है, 

जिस पर सरकार को गंभीरता से ध्यान देना चाहिए। सरकारी अस्पतालों में नर्सों को छठे वेतन आयोग की सिफारिशों के आधार पर वेतन और अन्य सुविधाएँ मिल रही हैं। उनकी हालत में भारी सुधार आया है, जिससे नर्सों का पलायन काफ़ी रुका है, लेकिन कुछ राज्यों और गैर सरकारी क्षेत्रों में आज भी नर्सों की हालत अच्छी नहीं है। उन्हें लंबे समय तक कार्य करना पडता है और उनको वे सुविधाएँ नहीं दी जाती हैं, जिनकी वे हकदार हैं। केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अनुसार सरकारी चिकित्सा महाविद्यालयों और अस्पतालों में नर्सों की कमी को देखते हुए भारत सरकार भी इस बात को गंभीरता से ली है।।