मन को समझने में चूक गए थे बापू ? लेखक: चैतन्य नागर

मन को समझने में चूक गए थे बापू ? लेखक: चैतन्य नागर

चैतन्य नागर

महात्मा गांधी न सिर्फ एक महान राजनेता, समाज-सुधारक और चिंतक थे, बल्कि रोज़मर्रा की ज़िन्दगी को लेकर उनके प्रयोग और विचार भी बहुत ईमानदार, दिलचस्प और गंभीर अध्ययन के योग्य हैं। पर विवेचनात्मक सोच की मांग है कि उनके सभी प्रयोगों की तार्किकता पर विचार किया जाए, क्योंकि एक ओर गांधी जी की व्यक्तिगत ईमानदारी और चट्टान सरीखी संकल्प शक्ति पर संदेह नहीं किया जा सकता, उनके सत्याग्रह की पवित्रता पर प्रश्न उठाना भी एक तरह का दुराग्रह ही होगा, पर साथ ही यह देखने की भी जरुरत है कि मानव मन की संरचना एवं आधुनिक मनोवैज्ञानिक समझ के आलोक में हुए सत्य के साथ उनके प्रयोगों का कितनी प्रासंगिकता है। क्या बापू के प्रयोग एक विशेष तरह के संस्कारों से प्रभावित थे? क्या वैज्ञानिक आधार पर उनकी कोई वैधता है? गांधी दर्शन के हर गंभीर छात्र को ये सवाल फिर से पूछने चाहिए। बापू एक सरल इंसान थे और संभव है कि अपनी नैसर्गिक सरलता के कारण उन्होंने मन की जटिलता को गहराई से परखने की आवश्यकता ही महसूस नहीं की। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि गांधी जी के जीवन में आस्था का बहुत महत्व था और इसके साथ आत्म-संयम एवं संकल्प की ताकत को मिलाकर बापू ने कई असंभव कार्यों को भी संभव करके दिखाया। उनकी आस्था ने उनको अपने प्रयोगों के आवश्यकता से अधिक बौद्धिक और वैज्ञानिक विश्लेषण से सभवतः रोका होगा। 

गांधी जी ने अहिंसा को परम धर्म के रूप में अपनाया था। उनका सोचना था कि कोई साहसी व्यक्ति ही अहिंसक हो सकता है। यह सही है, पर साथ ही गांधी गीता को अपनी मां की तरह मानते थे जिसमे नाते-रिश्तेदारों के बीच हुए युद्ध के दौरान दिया गया वह उपदेश शामिल है जिसमे युद्ध को रोकने के लिए नहीं, बल्कि उसमे पूरे उत्साह के साथ शामिल होने के लिए कहा गया है। ‘न योत्स्ये’ (मैं युद्ध नहीं करूँगा) कहने वाले अर्जुन को ‘क्लैव्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते’’  जैसे मन्त्र देकर उसे नपुंसक न बन कर, ह्रदय की दुर्बलता को त्याग कर युद्ध में कूद जाने की सलाह दी गई है।  गीता के बारे में अक्सर युद्धविरोधी नास्तिक यह कहते हैं कि यह युद्ध को बढ़ावा देती है। हालाँकि ऐसे तर्क के जवाब में गीता के अनुयायी यही कहते सुने गये हैं कि वास्तव में यह कृष्ण की देशना भौतिक स्तर पर नहीं बल्कि मनोवैज्ञानिक स्तर पर अच्छाई और बुराई की ताकतों के बीच युद्ध की बात करती है। अहिंसा की पूजा करने वाले गांधी जी को गीता को ‘अपनी माँ’ के समान मानकर हमेशा अपने साथ रखना और उसपर कोई संदेह न करना, उसकी शिक्षाओं पर प्रश्न न उठाना एक तरह से उनके जीवन में सक्रिय एक गहरे द्वंद्व और विरोधाभास की ओर इशारा करता है। एक और उदाहरण लिया जाए। पहले विश्व युद्ध में गांधी जी ने ब्रिटिश हुकूमत का समर्थन किया था और इतना नहीं इससे पहले दक्षिण अफ्रीका में रहते हुए उन्होंने बोअर युद्ध और ज़ुलू युद्ध में भी भारतीयों से अपील की थी कि वे ब्रिटिश सरकार का जंग में साथ दें। यह एक ऐसा तथ्य है जिसकी बापू खुद भी कभी तार्किक ढंग से व्याख्या नहीं कर पाए; इतिहासकारों के लिए इसने अच्छी-खासी मुसीबत खड़ी कर दी।

ब्रह्मचर्य के बारे में गांधी जी के विचार और उनके प्रयोग भी आधुनिक विज्ञान और मनोविज्ञान की सच्चाइयों के विरुद्ध जाते हैं। गांधी जी ने दमन का मार्ग अपनाया था। इसके पीछे गीता के सिद्धांत भी कुछ सीमा तक काम करते थे। ‘असंशयं महाबाहो मनो दुनिर्ग्रहं चलम् । अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते।। ‘(गीताः6.34)। इसका अर्थ है कि मन बड़ा ही अस्थिर और चंचल है पर अभ्यास के द्वारा और बार-बार प्रयत्न करने से यह वश में आता है। बिलकुल मूलभूत नैसर्गिक कामनाओं या इंस्टिंक्ट पर यह सिद्धांत लागू नहीं होता। आधुनिक मनोवैज्ञानिक बिलकुल भी ऐसा नहीं कहता। गाँधी जी अपने सिद्धांतों में निहित द्वंद्व को नहीं देख पा रहे थे, और वह यह स्वीकार नहीं कर पा रहे थे कि इस तरह के अभ्यास और दमन से मन एक बहुत ही पीड़ादायक द्वैत में फंस जाता है और ‘जो है’ एवं ‘जो होना चाहिए’ के बीच चलने वाले एक अनवरत द्वंद्व की लिए एक युद्धभूमि बन कर रह जाता है। मनोविज्ञान यह भी कहता है कि समय रहते यदि मन की नैसर्गिक प्रवित्तियों को अभिव्यक्ति न दी जाए और उनका दमन किया जाए तो जीवन में आगे चलकर वे बहुत ही विकृत रूप में भी व्यक्त हो सकती हैं। गौरतलब है कि एक ब्रह्मचारी का जीवन बिताने का गांधीजी का संकल्प गाँधी ने तभी लिया था जब वे करीब 35 वर्ष के थे, पर अपने जीवन के अंतिम वर्ष (1948) में भी गांधीजी अपनी वासनाओं के खिलाफ संघर्ष कर रहे थे और उन्हें लेकर तरह तरह के प्रयोग कर रहे थे। जगजाहिर है कि वह स्त्रियों के साथ सोते थे ताकि ब्रह्मचर्य की शक्ति का परीक्षण कर सकें। इसकी क्या आवश्यकता पड़ती थी, यह सवाल पूछा जाना चाहिए। जेड एडम्स ने अपनी चर्चित किताब ‘गाँधी: नेकेड एम्बिशन’ में इस तरह की कई घटनाओं का ज़िक्र किया है और उनपर सवाल भी उठाए हैं। इस लेख का यह उद्येश्य बिलकुल भी नहीं कि गाँधी जी के प्रयासों और प्रयोगों को निंदनीय ठहराया जाए, पर यह जरुरी है कि उनके प्रयोगों की वैज्ञानिकता पर विचार किया जाए, क्योंकि आज भी उनके लाखों अनुयायी हैं और उन्हें अपने महान नेता की अच्छाइयों और गलतियों---दोनों से ही सीख लेनी चाहिए। सेक्स को पूरी तरह से ख़त्म करने की उनकी जिद इंसान की मनोदैहिक अवस्था की सचाई को ध्यान में रखते हुए सही नहीं ठहराई जा सकती। सेक्स को एक निंदनीय कर्म मानने से बेहतर है कि उसे जीवन में समुचित स्थान देने की जरुरत पर बल दिया जाय तो बेहतर है। सेक्स एक स्वाभाविक आवश्यकता है; समस्या तब आती है जब वह हवस का रूप लेता है, उसमे हिंसा जुड़ जाती है और वह जरुरत से ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है। जब प्रेम और मैत्री की जगह सेक्स ले ले, तो जीवन में एक तरह का विकृत असंतुलन पैदा होने की सम्भावना बढ़ जाती है, पर उसकी जरुरत से पूरी तरह इनकार कर देना एक अलग तरह के अतिवाद को न्योतना है, जो समय समय पर व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में अपनी विराट समस्याओं के साथ प्रस्तुत होता रहेगा। सामाजिक और राजनीतिक जीवन में सत्याग्रही होने पर जोर देने वाले महात्मा ने अपने खुद की नैसर्गिक प्रवित्तियों को लेकर अक्सर एक दुराग्रही रवैया अपनाया था।

 गांधी जी ने सेल्फ या अहम् के समूचे ढाँचे और उसकी तासीर को समझने में कहीं भूल की थी। उनके लिए सेल्फ या अहम्, उच्चतर आत्म, एक लक्ष्य था जिसे प्राप्त करना आवश्यक ही नहीं, प्रत्येक मनुष्य का धर्म है और इसके लिए निम्नतर अहम् पर नियंत्रण करने पर उनका विश्वास था। यदि आतंरिक मन के मनोविज्ञान को बारीकी से देखा-समझा जाए तो बिलकुल स्पष्ट हो जायेगा कि परिष्कृत स्व, वृहत्तर या उच्चतर अहम बस एक आदर्श है जिसे निम्नतर स्व ने प्रक्षेपित किया है। यह वास्तव में उसी की परिष्कृत निरंतरता है जिसे हम निम्न कहते हैं। गौरतलब है  कि यह अध्यात्म और संगठित धर्मों की मूलभूत त्रुटियों में से है, कि उसने मनुष्य को ‘जो है’, जैसा वह है उसे समझने में सहायता किये बगैर उसे एक ऐसी काल्पनिक अवस्था या मनोदशा का स्वप्न दिखाया जिसमे वह उलझ कर रह गया। उसे यह समझ ही नहीं आया कि जिस उच्चतर मनोदशा को ध्येय बनाकर वह चला है वह उसके तथाकथित निम्नतर स्व का ही प्रक्षेपण है और एक काल्पनिक पलायन का माध्यम है। अंततः यह एक अनर्गल और स्वनिर्मित जंजाल बन जाता है जिसमे कोई फंस कर रह जाता है। आवश्यक यह है कि हम जैसे हैं और जो हैं उसे ही समझा जाए। उसकी पूरी समझ में ही सम्भवतः उसका अंत संभव है। हिंसा की समझ और उसके कारणों की पड़ताल, उन कारणों की समाप्ति में ही हिंसा का अंत है। अहिंसा का आदर्श हमे अहिंसक नहीं बना सकता और यह गलती मानवता पिछले 2500 वर्षों से किए जा रही है। अपने पडोसी को उतना ही प्यार करो, जितना खुद को, यह एक आदर्श है जिसे हम 2000 वर्षों से दोहराए जा रहे हैं, और जिस ईसाई मजहब ने सबसे अधिक बार दोहराया है, उसने इस धरती पर सबसे अधिक युद्ध भी किए! गांधी जी एक तरह से आतंरिक संसार के गहरे अन्वेषण से परहेज करते दिखाई देते हैं और कुछ पूर्वनिर्मित सिद्धांतों पर जीवन जीने की सलाह देते हैं। उनके स्तर का व्यक्ति जब ऐसा करता है तो वह बड़े पैमाने पर अपने अनुयायियों में भी भ्रम की स्थितियां पैदा कर देता है। उनकी महान उपलब्धियों और गुणों के बावजूद इन मनोवैज्ञानिक निष्कर्षों पर एक पैनी दृष्टि डालने की आवश्यकता है और इसीलिए यह आलेख एक तरह से उनके जीवन के गंभीर विरोधाभासों को जांचने का आमंत्रण है, गाँधी जी के भक्तों के लिए और आलोचकों के लिए भी। 

 गौरतलब है कि गांधीजी की यह ‘चूक’ उनकी महानता को किसी भी तरह कम नहीं करती। वे अपनी कमियों को कभी भी छिपाने का कोई प्रयास नहीं करते थे, पर यहाँ वह एक और चूक कर जाते हैं। सचाई तो यह है कि ‘मोसो कौन कुटिल खल कामी’ दोहराने वाला व्यक्ति भी अपनी कुटिलता, कामुकता और दुष्टता से मुक्त नहीं हो पाता। आत्मनिंदा या आत्मग्लानि वास्तव में आत्मश्लाघा का ही एक और पहलू है। पर परम्परागत, संस्कारबद्ध सोच में उलझा मन इस विरोधाभास को देखने से चूक जाता है और दुर्भाग्य से गांधीजी ने भी यही भूल कर दी थी। मनोवैज्ञानिक मुक्ति का सम्बन्ध खुद को जस का तस देख पाने की क्षमता से है। इसे बुद्ध 'यथाभूतं' कहते थे। आत्मश्लाघा की तरह आत्मग्लानि भी खुद को जस का तस देखने से रोकती है।

इन सभी तथ्यों के बावजूद वास्तविकता यह भी है कि बापू पूरे विश्व के लिए एक आलोक स्तम्भ थे और हमेशा रहेंगे भी। उनकी ईमानदारी, सत्य और न्याय के प्रति उनकी निष्ठा, समाज के आखिरी आदमी के लिए उनकी परवाह और जीवन के हर पहलू को लेकर उनके अनूठे प्रयोग और अंतर्दृष्टियां हर अर्थ में यह साबित करती हैं कि वे सही अर्थ में एक महात्मा थे। दुनिया में आज एक भी गांधी होता तो दुनिया जरूर बेहतर होती। उनकी उपस्थति मात्र सोती हुई मानवता को लगातार झकझोरने का काम करती रहती, और सभी नहीं तो भी कई तो अपनी नींद से बाहर आने में कामयाब होते ही।