काव्य-रचना

काव्य-रचना

    "बैरन"      

  गज़लें, बतियाते हैं,
स्वर्ण जैसे भूरे नैन।
दिखते छिप जाते है,
पलको से कितने रैन।
बिखरे से केशवाली,
 बैठ के निहारती है।
सकुचाती घबराती ,
आंचल सवारती है।
अधरो पे गीत लिखे,
मन ही मन गाए रही।
आशा की चिंगारी,
बैरन सुलगाए रही।
पूर्णिमा की रात में,
चांदनी-बन बहक रही।
आधे-अंधियारे में,
मदिरा सी महक रही।
कंगन की खनक पर ,
नृत्य नैना करते है।
बाघिन के पांव क्यूं!
भेड़ियों से डरते है?
आंचल आज़ाद फिर भी,
गांठ बांधे खड़ी रही।
मृत्यु सी जलती थी,
जीवन को अड़ी रही।
तारें कहाँ,टिमटिमाते!
ये तो उसकी बातें हैं।
जागती, सिसकती ,
बेचैन हुई रातें हैं।
हाथ थामे संयम का,
अंधियारा काट रही।
दुख का श्रृंगार कर,
उजियारा बाट रही।
अश्रु ,अक्षम्य थे,
आंचल से रोक लिए।
मन की अभिलाषाएं,
अग्नि को झोंक दिये।
रोटियां अब सेक रही,
उसी धैर्य आग से।
बाघिन है बेड़ियों में,
भेड़ियों के भाग से।।

अदिति पाण्डेय