100 से अधिक लाग-विमान बनेंगे आकर्षण का केंद्र, मोबाइल फोन के संभावित दुष्प्रभावों के प्रति भी किया जाएगा जागरूक
वाराणसी (रणभेरी): काशी की ऐतिहासिक चेतगंज नक्कटैया इस बार अपने 140वें वर्ष में खास अंदाज में नजर आएगी। मेले में 100 से अधिक लाग-विमान सामाजिक और समसामयिक विषयों को रोचक ढंग से प्रस्तुत करेंगे। वहीं, एयर शो की तर्ज पर आसमान में रोमांचक नजारे दिखाने की भी तैयारी है। इस बार मेले के जरिए बच्चों और महिलाओं को मोबाइल फोन के संभावित दुष्प्रभावों और रेडिएशन से बचाव के उपायों के प्रति जागरूक करने पर भी जोर रहेगा। नक्कटैया का उद्घाटन जिलाधिकारी सत्येंद्र कुमार करेंगे।
चेतगंज रामलीला समिति के पदाधिकारियों ने बुधवार को आयोजन की जानकारी दी। समिति के अध्यक्ष अजय गुप्ता ने बताया कि नक्कटैया में हर वर्ष की तरह इस बार भी लाग-विमानों के माध्यम से सामाजिक मुद्दों और समसामयिक घटनाओं को प्रदर्शित किया जाएगा। प्रयागराज, मिर्जापुर, जौनपुर, भदोही, ज्ञानपुर, जक्खिनी, आजमगढ़ और फूलपुर समेत विभिन्न क्षेत्रों से लाग-विमान मेले में पहुंचेंगे। इनकी आकर्षक प्रस्तुतियां देखने के लिए बड़ी संख्या में लोगों के जुटने की उम्मीद है।
लाग-विमानों में दिखेगा समाज का आईना
चेतगंज की नक्कटैया धार्मिक आयोजन के साथ सामाजिक जागरूकता का भी महत्वपूर्ण मंच है। लाग-विमानों के जरिए समाज में घट रही घटनाओं, ज्वलंत मुद्दों और प्रासंगिक विषयों को कलात्मक एवं रोचक तरीके से प्रस्तुत किया जाता है। इस बार मोबाइल फोन के इस्तेमाल और उससे जुड़े संभावित खतरों को भी प्रदर्शित किया जाएगा। बच्चों और महिलाओं को मोबाइल फोन के रेडिएशन से बचाव के उपायों की जानकारी देने की योजना है। समिति का उद्देश्य पारंपरिक आयोजन के जरिए लोगों तक सामाजिक जागरूकता का संदेश पहुंचाना है।
1888 में हुई थी नक्कटैया की शुरुआत
चेतगंज नक्कटैया की परंपरा वर्ष 1888 में शुरू हुई थी। समिति के अध्यक्ष अजय गुप्ता के अनुसार, करवाचौथ के दिन बाबा फतेहराम ने इसकी शुरुआत की थी। उस समय अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विरोध दर्ज कराने के लिए भगवान राम और रामायण के प्रसंगों को माध्यम बनाया गया था।
रामायण में शूर्पणखा की नाक काटे जाने के प्रसंग से जुड़ी नक्कटैया के जरिए अंग्रेजी शासन के प्रति विरोध व्यक्त किया जाने लगा। समय के साथ यह आयोजन काशी की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान बन गया। आज भी लाग-विमानों के माध्यम से सामाजिक और समसामयिक संदेश देने की परंपरा जारी है।
