काव्य-रचना
ग्लोबल होता लोक
लोक क्या तुम भूल गए
संस्कृति और परम्परा को
जो सदियों से संजोयी थी तुम्हारे पूर्वजों ने|
लोक क्या तुम ग्लोबल होने लगे
जो इतनी कृत्रिमता, आडम्बर को ओढ़ रखा है|
लोक क्या तुम गीत-कथाएँ भूल रहे हो
जो इतने पॉप सोंग्स गाते फिर रहे हो|
लोक क्या तुम भूल गए
एक समय जब शास्त्रीयता को नकारा था
और अब छंद, अलंकार को इतना ओढ़े हो|
लोक आखिर तुमने अपनी संस्कृति,
परम्परा, और पुरखा साहित्य को बढ़ावा क्यों नहीं दिया?
जो आज वैश्वीकरण, भूमंडलीकरण, औध्योगिकिकरन,
निजीकरण, और उदारीकरण को बढ़ावा दे रहें हो|
लोक क्या तुमने स्वयं को पहचाना है
जो विदेशी चीजो पर अधिक ध्यान देते हो
लोक क्या तुमने पुरखों को कभी याद किया है
जो इस अपूर्ण इतिहास को दोहराते रहे हो|
लोक कहा हो तुम...?
जो ग्राम से मुह मोड़ कर निकल गए
शहरों के किसी कोने में जा बसे
न किसी चुनाव रैली में दिखाई देते
न किसी गाँव के चौराहा पर
आखिर लोक तुम कहा हो
वह धीरे से कहता कि “मै स्वयं में हूँ”
धीरे-धीरे समाप्त हो रहा हूँ
क्योकिं मैं ग्लोबल हो रहा हूँ
नीलेश देशमुख शोधार्थी