वाराणसी (रणभेरी): धर्म और आस्था की नगरी काशी में वर्षभर हर-हर महादेव की गूंज सुनाई देती है। वहीं गणेश चतुर्थी आते ही बाबा विश्वनाथ की नगरी गणपति बप्पा के जयकारों से भी गूंजने लगती है। शहर की अलग-अलग गणेशोत्सव समितियां इस बार भी गणपति की प्रतिमाएं स्थापित करने की तैयारी में जुटी हैं। इनमें काशी गणेशोत्सव कमेटी का आयोजन विशेष महत्व रखता है। यह उत्सव काशी ही नहीं, बल्कि महाराष्ट्र से बाहर देश में सबसे पुराने सार्वजनिक गणेशोत्सवों में शामिल माना जाता है।
1897 में पड़ी थी सार्वजनिक गणेशोत्सव की नींव
काशी में सार्वजनिक गणेशोत्सव की शुरुआत वर्ष 1897 में हुई थी। बताया जाता है कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने वाराणसी पहुंचकर स्थानीय लोगों से विचार-विमर्श किया था। इसके बाद सरदार आंग्रे के बाड़े में गणेशोत्सव की शुरुआत हुई।
उस दौर में सार्वजनिक रूप से लोगों के एकत्र होने पर अंग्रेजी शासन की पाबंदियां थीं। ऐसे समय में गणेशोत्सव धार्मिक आयोजन के साथ-साथ समाज को एक मंच पर लाने का माध्यम भी बना। महाराष्ट्र से शुरू हुई सार्वजनिक गणेशोत्सव की परंपरा को तिलक ने देश के दूसरे हिस्सों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
आज भी नहीं बदला प्रतिमा का स्वरूप
काशी गणेशोत्सव कमेटी से जुड़े पदाधिकारियों के अनुसार, 129 वर्ष बाद भी इस आयोजन की कई पुरानी परंपराएं उसी रूप में जारी हैं। गणपति की करीब ढाई फीट ऊंची प्रतिमा का स्वरूप वर्षों से लगभग एक जैसा रखा गया है।

कमेटी के अध्यक्ष सुनील तीतले के मुताबिक, जिस भवन में यह आयोजन शुरू हुआ था, उसी परिसर में आज भी गणेशोत्सव की परंपरा निभाई जा रही है। वर्ष 1962 में समिति ने इस भवन को खरीद लिया था।
हिंदी, मराठी और संस्कृत में होती है तैयारी
गणेशोत्सव की तैयारियां केवल प्रतिमा स्थापना तक सीमित नहीं रहतीं। समिति की ओर से विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं। तीतले के अनुसार, गुरु पूर्णिमा से ही पद्यगान की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। इसमें हिंदी, मराठी और संस्कृत भाषाओं का प्रयोग किया जाता है।
समिति में पूजा-पाठ की परंपरा भी वैदिक विधि से निभाई जाती है। यही वजह है कि 129 साल पुराने इस आयोजन में आधुनिकता के बीच भी इसकी पारंपरिक पहचान बरकरार है।
धर्म के साथ राष्ट्रभावना से भी जुड़ा रहा आयोजन
सार्वजनिक गणेशोत्सव की शुरुआत के पीछे धार्मिक उद्देश्य के साथ सामाजिक और राष्ट्रीय चेतना को मजबूत करने की भावना भी जुड़ी थी। तिलक ने गणेशोत्सव को ऐसा माध्यम बनाया, जिसके जरिए बड़ी संख्या में लोग एक साथ जुट सकें और उनमें सामाजिक एकजुटता तथा देश के प्रति जागरूकता पैदा हो।
काशी में शुरू हुआ यह आयोजन समय के साथ आगे बढ़ता गया और आज भी उसी ऐतिहासिक परंपरा की कड़ी के रूप में जारी है। गणेश चतुर्थी पर जब यहां प्रथम पूज्य गणेश की प्रतिमा स्थापित होती है, तो काशी की गलियों में महादेव के जयघोष के साथ गणपति बप्पा के जयकारे भी सुनाई देने लगते हैं।
