(रणभेरी): सहारनपुर में कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित मस्जिद को हटाए जाने के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मस्जिद कमेटी को फिलहाल बड़ी राहत दी है। शुक्रवार को मामले की सुनवाई करते हुए अदालत ने प्रशासन की ओर से लगाए गए करीब 6.41 करोड़ रुपये के जुर्माने की वसूली पर अंतरिम रोक लगा दी। कोर्ट ने राज्य सरकार को मामले में अपना पक्ष रखते हुए अगले तीन सप्ताह के भीतर काउंटर एफिडेविट दाखिल करने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 12 अक्टूबर को होगी।
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति रोहित रंजन अग्रवाल की एकल पीठ में हुई। मस्जिद कमेटी के मुतवल्ली मोहम्मद तनवीर अहमद की ओर से 9 सितंबर को हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की गई थी। याचिका में प्रशासन की कार्रवाई को चुनौती देते हुए आरोप लगाया गया कि मस्जिद को गिराने से पहले पर्याप्त कानूनी नोटिस नहीं दिया गया और न ही वैध ध्वस्तीकरण आदेश की प्रक्रिया पूरी की गई।
याचिकाकर्ता पक्ष का कहना है कि प्रशासन ने 5 सितंबर को कलेक्ट्रेट परिसर में बनी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया, जबकि मस्जिद कमेटी को न्यायिक स्तर पर अपनी बात रखने का पर्याप्त अवसर मिलना चाहिए था। इसी कार्रवाई को लेकर हाईकोर्ट में राहत की मांग की गई है।
जुमे की नमाज को लेकर सहारनपुर में कड़ा सुरक्षा घेरा
मस्जिद गिराए जाने के बाद पहली जुमे की नमाज को देखते हुए सहारनपुर में शुक्रवार को सुरक्षा व्यवस्था बेहद सख्त रही। प्रशासन ने संवेदनशील इलाकों में अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया। PAC और RRF के करीब एक हजार जवानों को सुरक्षा व्यवस्था में लगाया गया।
शहर के प्रमुख धार्मिक स्थलों, बाजारों और भीड़भाड़ वाले इलाकों में पुलिस की निगरानी बढ़ाई गई। कई स्थानों पर ड्रोन के जरिए भी स्थिति पर नजर रखी गई। प्रमुख मस्जिदों के आसपास पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई थी।
जामा मस्जिद में भी बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी तैनात रहे। यहां करीब 150 जवानों की ड्यूटी लगाई गई थी। मस्जिद के आसपास सुरक्षा घेरे में जवानों को निर्धारित दूरी पर तैनात किया गया। पुलिस अधिकारियों के मुताबिक, शुक्रवार की नमाज शांतिपूर्वक संपन्न हुई और जिले में किसी अप्रिय घटना की सूचना नहीं मिली।

16 घंटे तक चला था ध्वस्तीकरण अभियान
कलेक्ट्रेट परिसर में बनी मस्जिद को प्रशासन ने 5 सितंबर को अवैध निर्माण बताते हुए ध्वस्त कर दिया था। कार्रवाई के दौरान करीब छह बुलडोजर लगाए गए और लगभग 16 घंटे तक निर्माण हटाने का काम चला।
ध्वस्तीकरण के बाद मलबा हटाने के दौरान जमीन के नीचे एक कुआं भी सामने आया। इसके बाद पुरातात्विक महत्व की संभावना को देखते हुए ASI की टीम मौके पर पहुंची। टीम के तीन अधिकारियों ने कुएं के भीतर जाकर स्थिति का निरीक्षण किया और उसकी गहराई मापने के लिए फीते का इस्तेमाल किया।
जांच के दौरान अधिकारियों ने प्रारंभिक तौर पर कुएं के करीब 200 से 250 वर्ष पुराना होने की संभावना जताई। हालांकि इसकी वास्तविक उम्र और ऐतिहासिक महत्व को लेकर अंतिम निष्कर्ष विस्तृत जांच के बाद ही सामने आएगा।
प्रशासन और मस्जिद पक्ष के दावे अलग-अलग
मस्जिद गिराने की कार्रवाई को लेकर प्रशासन और मस्जिद कमेटी की दलीलें अलग हैं। प्रशासन का कहना है कि ध्वस्तीकरण की कार्रवाई न्यायिक आदेश के बाद की गई। वहीं मस्जिद पक्ष का आरोप है कि उसे हाईकोर्ट में प्रभावी तरीके से अपील करने का पर्याप्त अवसर दिए बिना कार्रवाई कर दी गई।
मस्जिद पक्ष के अधिवक्ता बाबर वसीम ने कार्रवाई को अदालत में चुनौती देने की बात कही थी। दूसरी ओर, मस्जिद के खिलाफ शिकायत करने वाले विकास त्यागी ने दावा किया था कि इस स्थान पर पहले मंदिर मौजूद रहा होगा और बाद में उसे हटाकर मस्जिद का निर्माण कराया गया। इस दावे को लेकर भी विवाद बना हुआ है।
शिकायत के बाद शुरू हुई थी जांच
कलेक्ट्रेट परिसर में बनी यह मस्जिद करीब 3,300 वर्गफीट क्षेत्र में थी। बताया गया कि दो मंजिला भवन में दो बड़े हॉल और पांच कमरे थे। निचली मंजिल पर एक बड़ा हॉल और दो कमरे थे, जबकि पहली मंजिल पर हॉल के अलावा एक बड़ा कमरा था। इनमें से एक कमरे में डाकघर संचालित होने की बात सामने आई थी।
मस्जिद के निर्माण और परिसर के इस्तेमाल को लेकर विवाद उस समय शुरू हुआ जब 10 फरवरी 2025 को बजरंग दल के पूर्व प्रांत संयोजक विकास त्यागी ने जिलाधिकारी से शिकायत की। शिकायत में निर्माण को कथित तौर पर अवैध बताते हुए परिसर के कमरों और डाकघर से किराया लिए जाने के आरोप लगाए गए थे।
शिकायत के बाद जिलाधिकारी ने मामले की जांच के लिए मजिस्ट्रेट को निर्देश दिए। जांच पूरी होने के बाद प्रशासन की ओर से मस्जिद को अवैध निर्माण माना गया।
पहले मजिस्ट्रेट, फिर जिला अदालत पहुंचा मामला
प्रशासन ने 24 मार्च 2025 को नगर मजिस्ट्रेट की अदालत में इस मामले से संबंधित याचिका दाखिल की। इसके बाद 16 जुलाई 2026 को नगर मजिस्ट्रेट की अदालत ने मस्जिद को अवैध मानते हुए उसे हटाने का आदेश दिया। साथ ही संबंधित पक्ष से करीब 6.41 करोड़ रुपये की क्षतिपूर्ति वसूलने का निर्देश दिया गया। कब्जेदारों को निर्माण हटाने के लिए 30 दिन का समय दिया गया था।

मस्जिद पक्ष ने इस आदेश को चुनौती देते हुए 20 जुलाई को जिला अदालत का रुख किया। इसके बाद 24 जुलाई को जिला अदालत ने नगर मजिस्ट्रेट के आदेश पर रोक लगाते हुए मामले की सुनवाई जारी रखी।
हालांकि मामला यहीं नहीं रुका। 2 सितंबर को जिला जज सतेंद्र कुमार की अदालत ने नगर मजिस्ट्रेट के ध्वस्तीकरण संबंधी आदेश को बरकरार रखा और मस्जिद पक्ष की याचिका खारिज कर दी।
इसके बाद मस्जिद कमेटी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अब हाईकोर्ट ने 6.41 करोड़ रुपये की वसूली पर अंतरिम रोक लगाते हुए सरकार से तीन सप्ताह में जवाब मांगा है। अगली सुनवाई 12 अक्टूबर को होगी। तब मामले में अदालत के सामने सरकार का पक्ष और आगे की कानूनी स्थिति स्पष्ट होने की उम्मीद है।
