- कई प्राचीन मंदिर जीर्ण-शीर्ण, कुछ पर अतिक्रमण तो कहीं आवारा पशुओं का डेरा
- नमामि गंगे गंगा विचार मंच ने महाशिवरात्रि से पहले शुरू किया विशेष सफाई अभियान
- बूंदीपरकोटा घाट की शिव कचहरी में घंटों श्रमदान कर गंगाजल से हुआ शुद्धिकरण
वाराणसी (रणभेरी)। आस्था की राजधानी काशी, जहां गंगा बहती हैं और हर कण में शिव का वास माना जाता है, वहीं गंगा तट पर स्थित कई प्राचीन शिवालय आज उपेक्षा और जर्जरता की मार झेल रहे हैं। मंदिरों की नगरी कही जाने वाली काशी में घाट किनारे मौजूद अनेक शिव मंदिर बदहाल अवस्था में पड़े हैं। कहीं दीवारें झड़ रही हैं, कहीं सीढ़ियां टूटी हैं, तो कई स्थानों पर मंदिर परिसर में गंदगी और सिल्ट की मोटी परत जमी हुई है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार काशी देवाधिदेव महादेव की प्रिय नगरी है। कहा जाता है कि यहां का कंकड़-कंकड़ शिवमय है और हर शिवलिंग बाबा विश्वनाथ के स्वरूप के समान पूज्य है। इसके बावजूद गंगा तट के कई छोटे-बड़े शिवालय नियमित देखरेख के अभाव में अपनी पहचान खोते जा रहे हैं। कुछ मंदिरों पर अतिक्रमण की शिकायतें भी सामने आई हैं, जबकि कई स्थानों पर आवारा कुत्तों ने डेरा जमा लिया है।

ऐसी स्थिति न केवल धार्मिक भावनाओं को आहत करती है, बल्कि सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करती है। इसी चिंताजनक स्थिति को देखते हुए नमामि गंगे गंगा विचार मंच महानगर इकाई ने गंगा तट स्थित शिवालयों की सफाई और संरक्षण का बीड़ा उठाया है। महाशिवरात्रि से पूर्व चलाए जा रहे इस विशेष अभियान के तहत विभिन्न घाटों पर स्थित मढ़ियों और मंदिरों की सफाई की जा रही है। स्वयंसेवक मंदिर परिसरों से गाद, कचरा और झाड़-झंखाड़ हटाकर उन्हें स्वच्छ स्वरूप देने में जुटे हैं।
मंगलवार को अभियान के तहत बूंदीपरकोटा घाट स्थित प्रसिद्ध शिव कचहरी मंदिर में विशेष सफाई की गई। टीम के सदस्यों ने घंटों श्रमदान कर मंदिर परिसर को साफ किया। इसके बाद गंगाजल से पूरे प्रांगण का शुद्धिकरण किया गया और देव विग्रहों का विधिवत स्नान कराकर पूजन-अर्चन संपन्न हुआ। इस दौरान स्थानीय श्रद्धालुओं ने भी सहयोग कर अभियान की सराहना की।
अभियान का नेतृत्व कर रहे नमामि गंगे के जिला संयोजक शिवम अग्रहरि ने बताया कि हर वर्ष बाढ़ के दौरान गंगा का जलस्तर बढ़ने से घाट किनारे बने कई छोटे मंदिरों में सिल्ट भर जाती है, जिससे वे धीरे-धीरे उपयोग से बाहर होते जा रहे हैं। नियमित पूजा-पाठ न होने से इन स्थानों की पवित्रता और पहचान दोनों प्रभावित हो रही हैं। उन्होंने कहा कि अभियान का उद्देश्य केवल सफाई तक सीमित नहीं, बल्कि काशी की धार्मिक धरोहरों के संरक्षण के प्रति जनजागरूकता फैलाना भी है।

इस पहल में सत्यप्रकाश कुशवाहा, जय विश्वकर्मा, किरण पांडेय, अनुराग सोनकर सहित कई स्वयंसेवक सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। संस्था का कहना है कि यदि स्थानीय लोग और प्रशासन मिलकर प्रयास करें तो इन प्राचीन शिवालयों को फिर से आस्था के जीवंत केंद्र के रूप में विकसित किया जा सकता है। गंगा तट के ये शिवालय केवल पूजा के स्थल नहीं, बल्कि काशी की आध्यात्मिक विरासत के जीवंत प्रतीक हैं। समय रहते संरक्षण न हुआ तो ये धरोहरें इतिहास के पन्नों तक सीमित होकर रह जाएगा।
