वाराणसी (रणभेरी): बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर काशी में श्रद्धालुओं का भारी जमावड़ा देखने को मिला। सारनाथ स्थित मूलगंध कुटी विहार में भगवान बुद्ध के पवित्र अस्थि अवशेषों के दर्शन के लिए सुबह से ही भक्तों की लंबी कतारें लग गईं। दर्शन का क्रम सुबह लगभग 6:30 बजे शुरू हुआ, जो दोपहर तक जारी रहा।
दोपहर बाद शहर के कचहरी क्षेत्र से धम्म यात्रा निकाली जाएगी, जो सारनाथ स्थित मंदिर परिसर तक पहुंचेगी। इसके बाद धम्म सभा, सांस्कृतिक प्रस्तुतियां और उपदेश कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।

दीपों से सजेगा मंदिर परिसर
शाम होते ही मंदिर को लगभग 5000 दीपकों से सजाया जाएगा, जिससे पूरा परिसर आध्यात्मिक आभा से आलोकित होगा। आयोजन में देश-विदेश से आए करीब 70 हजार बौद्ध अनुयायियों के शामिल होने का अनुमान है। श्रद्धालुओं के लिए भोजन की विशेष व्यवस्था भी की गई है, जो सुबह 10 बजे से रात 10 बजे तक जारी रहेगी।
बुद्ध पूर्णिमा का विशेष महत्व
महाबोधि सोसाइटी से जुड़े भिक्षु सम्मितानंद थेरो के अनुसार, यह दिन बौद्ध अनुयायियों के लिए सबसे पवित्र माना जाता है। मान्यता है कि इसी दिन गौतम बुद्ध का जन्म, ज्ञान प्राप्ति और महापरिनिर्वाण तीनों हुए थे। इस कारण यह दिन विशेष श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
बताया जाता है कि बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद उनके अवशेषों को कई भागों में विभाजित कर विभिन्न स्थानों पर स्तूपों में सुरक्षित रखा गया था। बाद में सम्राट अशोक ने इन अवशेषों को पुनः वितरित कर व्यापक रूप से स्थापित कराया। इन्हीं में से एक पवित्र अवशेष को 20वीं सदी में वाराणसी लाया गया और सारनाथ के मूलगंध कुटी विहार में सुरक्षित रखा गया
धर्म प्रचार की शुरुआत यहीं से
इतिहासकारों के अनुसार, सारनाथ वह स्थान है जहां बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के बाद अपना पहला उपदेश दिया था। यह स्थल बौद्ध धर्म के चार प्रमुख तीर्थों में गिना जाता है। अन्य प्रमुख स्थलों में लुंबिनी, बोधगया और कुशीनगर शामिल हैं।

विशेष दर्शन की परंपरा
पहले यहां केवल कार्तिक पूर्णिमा पर ही पवित्र अवशेषों के दर्शन होते थे, लेकिन हाल के वर्षों में बुद्ध पूर्णिमा पर भी यह अवसर दिया जाने लगा है। हालांकि पिछले वर्ष अवशेष विदेश में होने के कारण दर्शन संभव नहीं हो सके थे। बुद्ध पूर्णिमा के इस पावन अवसर पर काशी और सारनाथ एक बार फिर श्रद्धा, शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा के केंद्र बने हुए हैं।
