वाराणसी (रणभेरी): काशी विश्वनाथ मंदिर में प्रस्तावित नई ऐप आधारित दर्शन व्यवस्था को लेकर राजनीतिक माहौल गरमा गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हालिया दौरे के बाद इस डिजिटल प्रणाली को लागू करने की तैयारी पर आम श्रद्धालुओं के साथ-साथ विपक्षी दलों ने भी सवाल उठाए हैं।
शुक्रवार को मंदिर परिसर के बाहर विरोध की आशंका के चलते भारी पुलिस बल तैनात किया गया। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और समाजवादी पार्टी दोनों ने इस व्यवस्था को लेकर प्रशासन की मंशा पर गंभीर आरोप लगाए हैं।
कांग्रेस के स्थानीय नेतृत्व ने इसे आस्था के साथ हस्तक्षेप बताते हुए कहा कि मंदिर की पारंपरिक व्यवस्था को डिजिटल प्रक्रियाओं में बांधने की कोशिश हो रही है। उनका आरोप है कि प्रशासन मंदिर प्रबंधन को प्रयोग के तौर पर चला रहा है, जिससे सनातन परंपराओं पर असर पड़ सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि इस तरह की व्यवस्था से आम श्रद्धालु, विशेषकर ग्रामीण, बुजुर्ग और तकनीक से दूर लोग, कठिनाई में पड़ेंगे।
विपक्ष का यह भी कहना है कि मंदिर व्यवस्था को अत्यधिक नियंत्रित और व्यावसायिक बनाने की दिशा में कदम उठाए जा रहे हैं। उनका आरोप है कि दर्शन व्यवस्था को सरल रखने के बजाय इसे तकनीकी माध्यमों पर निर्भर बनाया जा रहा है, जिससे असमानता बढ़ेगी और स्थानीय लोगों को परेशानी होगी।
समाजवादी पार्टी ने भी इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि धार्मिक आस्था को किसी तरह के बंधन में नहीं रखा जाना चाहिए। पार्टी के नेताओं का कहना है कि नई प्रणाली से श्रद्धालुओं की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है।
इस बीच, प्रशासन पर यह आरोप भी लगाए गए हैं कि वह श्रद्धालुओं की सुविधा के बजाय वीआईपी व्यवस्थाओं और दिखावे पर अधिक ध्यान दे रहा है। स्थानीय स्तर पर यह मांग उठी है कि मंदिर में पारंपरिक और सहज दर्शन व्यवस्था को बरकरार रखा जाए।
विपक्षी दलों ने चेतावनी दी है कि यदि इस निर्णय पर पुनर्विचार नहीं किया गया तो व्यापक स्तर पर आंदोलन किया जाएगा। साथ ही कुछ अधिकारियों को हटाने और स्थानीय लोगों के लिए विशेष व्यवस्था सुनिश्चित करने की मांग भी सामने आई है।
गौरतलब है कि काशी की पहचान उसकी प्राचीन धार्मिक परंपराओं, सांस्कृतिक विरासत और आध्यात्मिक वातावरण से जुड़ी रही है। ऐसे में नई व्यवस्था को लेकर उठ रहे सवालों ने इस मुद्दे को राजनीतिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर चर्चा का विषय बना दिया है।
