काव्य-रचना

काव्य-रचना

   कर्म और धर्म   

ढूढ़ रहे हो खुशी
कौन नहीं है दुःखी
लालसा घिरी आत्मा
तब झूठ है परमात्मा
पाखंड का आचरण
करते महंत विचरण
स्वयं लोलुपता ग्रसित
रचते स्वांग ऐसे पतित
मैं करता गूढ़ बातें
माने तो दुःख जाते
किया न चीवर धारण
'सूर्यदीप' सच आवरण
तर्क से खोजो जवाब
मिले उत्तर लाजवाब
पाखंड में जकड़े लोग
जीवनभर दुःख भोग
सोच समझ निकल 
वरना यूहीं रह विकल
है ज्ञान से विवेकशील
अष्टांग और पंचशील
बस मानवता धारे
गायब दुःख सारे
मेरे सुख तेरे कर्म 
तेरे दुःख मेरे धर्म

 सूर्यदीप कुशवाहा