काशी के राजेंद्र प्रसाद घाट पर गूंजा चीपो-चीपो गंदर्भ राग, सजी मूर्खों की महफिल; खूब चले व्यंग्य बाण

काशी के राजेंद्र प्रसाद घाट पर गूंजा चीपो-चीपो गंदर्भ राग, सजी मूर्खों की महफिल; खूब चले व्यंग्य बाण

वाराणसी (रणभेरी): वाराणसी के राजेंद्र प्रसाद घाट पर की सीढि़यों पर हजारों श्रोता सिर्फ ठहाका लगाने और महामूर्ख बनने के लिए एकत्र हुए । इस कार्यक्रम में धोबिया नृत्य के अलावा बेमेल शादी, नगाड़े की थाप पर डांस और गर्दभ की चीपो-चीपो सुनने के लिए लोग जुटें। सबसे बड़ी बात यह है कि इस आयोजन में एक से बढ़कर एक बुद्धिजीवी रहते हैं, लेकिन नाम इसे महामूर्ख मेला दिया जाता है। काशीवासियों की भीड़ जहां हंसी ठिठौली के बीच एक ऐसी परंपरा भी निभाई जाती है जो हमारे और आपके जीवन का महत्वपूर्ण अंग है।

इस आयोजन में दुल्हन की जगह लड़का दूल्हे की जगह लड़की और पंडित जी की जगह कवि जो अगड़म बगड़म शेरो शायरी के साथ शादी पूरी करते हैं और फिर शादी टूट भी जाती है। इस बार इस परंपरा को निभाने के लिए शहर के बड़े डॉक्टर शिवशक्ति प्रसाद द्विवेदी दुल्हन की भूमिका में थे जबकि उनकी पत्नी और प्रसिद्ध डॉ.नेहा द्विवेदी दूल्हे की भूमिका में थी। बंगाली रीति रिवाज का मुकुट धारण करके पत्नी दूल्हा बनकर बारात लेकर पहुंची।

कवियों ने इस परंपरा को निभाने के बाद कवियों की महफिल सजी बनारस समेत उत्तर प्रदेश और देश के अलग-अलग हिस्सों से मौजूद कवियों ने खूब समां बांधा एक से शहर हंसी दीपावली के बीच जमकर शेरो शायरी और व्यंग्य के बाण चले। 

कवियों ने एक से बढ़कर एक व्यंग पेश करते हुए लोगों को हंसने पर मजबूर कर दिया। उत्तर प्रदेश पुलिस व साइबर क्राइम पुलिस के प्रतिनिधियों ने साइबर क्राइम पर अपना पक्ष रखकर उपस्थित उन मूर्खों को जागरूक किया जिन को साइबर ठग लूट लिया करते हैं जिससे वे दोबारा मूर्ख ना बन सके। महामूर्ख मेले की शुरुआत 1969 में दशाश्वमेध घाट पर बजड़े पर हुई। इसमें यूपी के राज्यपाल सर होमी मोदी के पुत्र सांसद पीलू मोदी दूल्हा व काशी के रईस महेंद्र शाह को दुल्हन बनाया गया था। अब तक महामूर्ख सम्मेलन में कई मंत्री, सांसद, विधायक, चिकित्सक दूल्हा-दुल्हन बन चुके हैं। महामूर्ख मेले के पहले संयोजक पं. धर्मशील चतुर्वेदी थे। उनके निधन के बाद सांड़ बनारसी व दमदार बनारसी इसका संयोजन कर रहे हैं।

संयोजक दमदार बनारसी का कहना है कि 56 सालों में महामूर्ख मेले की जगह बदली लेकिन कलेवर में कोई बदलाव नहीं आया। बिना किसी निमंत्रण के काशी की जनता का समुदाय डॉ. राजेंद्र प्रसाद घाट के मुक्ताकाशीय मंच पर एकत्र होता है। 1971 में महामूर्ख मेला दशाश्वमेध घाट से भद्दोमल की कोठी में किया गया। इसमें लोगों की भीड़ कम होती थी। दस साल तक आयोजन के बाद दो साल तक चौक थाना परिसर में इसका आयोजन हुआ। इसके बाद 1983 से 1985 तक नागरी नाटक मंडली में इसका आयोजन हुआ। 1986 में इसे डॉ. राजेंद्र प्रसाद घाट पर लाया गया और 38 सालों से आज तक अनवरत इसका आयोजन हो रहा है।