चोरों को बचाने को भेलूपुर पुलिस ने बेच दिया ईमान !

चोरों को बचाने को भेलूपुर पुलिस ने बेच दिया ईमान !
  • ट्रांसफर से एक दिन पहले सब इन्स्पेक्टर शिवम श्रीवास्तव ने दिया काले कारनामे को अंजाम 
  • 161 सीआरपीसी के तहत वादी साक्षी का नहीं लिया गया बयान 
  • कोर्ट के आदेश के बाद दर्ज मुकदमें की फाईल पुलिस ने 45 दिनों में कर दी बंद

वाराणसी (रणभेरी/विशेष संवाददाता)। कोई नाम बेच देता है, कोई काम बेच देता है...पैसों में होती है इतनी ताकत, की एक वदीर्वाला भी अपना ईमान बेच देता है ! वर्तमान हालातों की अगर गहराई से समीक्षा की जाय तो ऐसा लगता ही की न्याय व्यवस्था अब रसूखदारों और धन्नासेठों के हाथ की कठपुतली बन गई है। ऐसा लगता है कि अगर आपके पास पैसा है तो आप गुनहगार होकर भी बेगुनाह साबित हो सकते हैं। वजह है पुलिस की विवेचना पर सवाल खड़े होना। कई ऐसे अनसुलझे मामले सामने देखने को मिलते हैं, जिसमें पुलिस की भूमिका संदिग्ध रहती है। बड़े मामलों को छोटा करने, विवेचना के दौरान नाम जोड़ने और हटाने, बीना मामले की तफ्तीश किए मनमुताबिक अंतिम रिपोर्ट लगाने में पुलिस माहिर हो चुकी है। पुलिस अपने चहेतों के खिलाफ लगने वाली संगीन धारा को मामूली में बदलने और उसे निर्दोष साबित कर अंतिम रिपोर्ट लगाने की कला बखूबी जानती है। न्यायालय तो अपना काम बखूबी करती लेकिन जब विवेचना करने वाला ही अगर अपना ईमान बेच दिया हो फिर सवाल उठना लाजमी है की पीड़ित को न्याय कैसे मिलेगा।

ताजा मामला वाराणसी पुलिस कमिश्नरेट के भेलूपुर थाना का है जहां विवेचक ही अपनी जिम्मेदारी और कर्तव्य को भूल रसूखों के आगे अपना ईमान बेच दिया। दरअसल, चन्द्रभूषण सिंह का वाराणसी के भेलूपुर थाना क्षेत्र के मानस नगर कालोनी, दुगार्कुंड में एक मकान है। वो अपने कारोबार के सिलसिले में अक्सर वाराणसी से बाहर आते-जाते रहते है। चन्द्रभूषण सिंह का मानस नगर कालोनी स्थित भवन जर्जर हालत में था। कुछ वर्ष पूर्व उन्होंने उसे गिरवा दिया और नया मकान बनवाने के उद्देश्य से उन्होंने काफी पैसा खर्च कर भवन को चारदीवारी से घेर कर उसमें दो लोहे के गेट व पानी हेतु बोरिंग करवा कर सबमर्सिबल पम्प लगवा दिया। सुरक्षा की दृष्टि से उन्होंने चहारदीवारी पर लोहे कि ग्रिल को घेरवा दिया तथा टीनशेड लगवा दिया। दर्ज प्राथमिकी के मुताबिक उपरोक्त काम करवाने के बाद  चन्द्रभूषण सिंह ने मकान की देखरेख व सुरक्षा के लिए अपने परिचित संजय कुमार सिंह, शीतांशु सिंह उर्फ सत्यम, निशांत सिंह उर्फ शिवम सिंह, बृजेश सिंह को विश्वास पात्र होने के कारण मकान की चाभी दे दी। इनलोगों के साथ इनका साथी धर्मदेव सिंह भी इनके साथ मकान पर देखरेख ले लिए आता था।

चंद्रभूषण सिंह अपने व्यवसायिक काम से वाराणसी से दिसम्बर 2021 से बाहर थे। इसी बीच जब इन्होंने भवन के रखवालों से संपर्क करना चाहा तो नहीं हुआ। तब चंद्रभूषण सिंह में अपने मित्र मायानाथ मौर्या को मकान पर भेजा। जब मायानाथ उक्त मकान पर गए तो देखा की मकान में तोड़-फोड़ हुआ है। मायानाथ मौर्या ने फोन से इसकी सूचना चंद्रभूषण सिंह को दी। चंद्रभूषण सिंह ने जब अपने पड़ोसियों से इस बारे में पता किया तो मालूम चला की दिन-दहाड़े संजय कुमार सिंह, शितांशु कुमार सिंह, निशांत सिंह उर्फ शिवम, बृजेश सिंह व धर्मदेव सिंह ने अपने 9-10 साथियों के साथ ट्रैक्टर से आए और मकान में घुसकर  प्लाट में बोरिंग के समर्शीबल पम्प को उखाड़ कर व चारदीवारी पर लगे लोहे के ग्रिल को तोड़कर व गेट को तोडकर परिसर के अन्दर टीनशेड निर्मित कमरे में रखे पुराने लकड़ी के कीमती खिड़की, दरवाजे ट्रैक्टर पर लादकर उठा ले गए

थाने की चक्कर लगवाती रही भेलूपुर पुलिस

चंद्रभूषण सिंह ने घटना की सूचना अपने मित्र मायानाथ मौर्या को पुलिस को देने को कहा। मायानाथ मौर्या ने 17 अप्रैल 2023 को घटना की सूचना डायल 112 नं. पर दी। उसके बाद पीड़ित लिखित तहरीर लेकर भेलूपुर थाने पहुंचे। वहां पुलिस टालमटोल करती रही और अंतत: मुकदमा दर्ज नहीं किया। यह कह कर टरका दिया गया की जांच के बाद कार्रवाई होगी। दर्ज प्राथमिकी के अनुसार, चंद्रभूषण सिंह ने जब इसके बारे में संजय कुमार सिंह व बृजेश सिंह से उठा ले गए सामनों के बारे में पूछा तो उसने भद्दी-भद्दी गालियाँ व जान से मार कर खत्म कर देन की धमकी देते हुए कहे कि अपना सामान भूल जाओ नहीं तो जिंदा नहीं बचोगे। हम ऊंचे पहुंच वाले व्यक्ति है। महिला उत्पीड़न के झूठे मुकदमे में फंसाकर जेल भेजवा देंगे। धमकी से सहमे चंद्रभूषण सिंह फिर भेलूपुर थाने पर गए और मुकदमा दर्ज करने का निवेदन किया लेकिन पुलिस फिर यह कह कर  टरका दी की जांच की जा रही लेकिन मुकदमा दर्ज नहीं किया। अब सवाल यह उठता है की भेलूपुर पुलिस बीना तहरीर और प्राथमिकी के किस आधार पर जांच कर रही थी !

न्यायालय के आदेश पर दर्ज हुआ मुकदमा

जब चंद्रभूषण सिंह थाने और उच्चाधिकारी के कार्यालय का चक्कर काटते काटते थक गए तो उन्होंने अंत में न्यालय की शरण ली। न्यायालय ने घटना को गंभीरता से संज्ञान लेकर भेलूपुर थाने को मुकदमा दर्ज कर विवेचना का आदेश दिया तब जाकर मुकदमा दर्ज हुआ। मुकदमे की विवेचना भेलूपुर थाने पर तैनात तत्कालीन दारोगा शिवम श्रीवास्तव को सौंपी गई।

तत्कालीन एसीपी ने विवेचना को किया था वापिस 

जब मुकदमे की वेवचना का अंतिम रिपोर्ट तत्कालीन एसीपी ने देखी तो उन्होंने विवेचना को गलत करार कर वापिस कर दिया। उन्होंने अपने आदेश में लिखा कि विवेचना में शिकायतकर्ता का बयान दर्ज नहीं किया गया है, न ही घटना स्थल का निरीक्षण किया गया है।  आदेश में लिखा की वेवचक ने मकान के क्रय विक्रय अथवा विवाद के बारे में भी कोई जानकारी हासिल नहीं की न ही कोई साक्ष्य संकलन किया गया। विवेचक ने घटना के चश्मदीद गवाह मायानाथ मौर्या का भी बयान नहीं लिया गया। आदेश दिया की सम्पूर्ण घटना में प्रभावी साक्ष्य संकलन कर पुन: विवेचना की जाय और मामले में कार्यवाही व प्रगति से अवगत कराएं। तत्कालीन एसीपी प्रवीण सिंह के आदेश के बाद यह विवेचना पुन: दारोगा श्रीप्रकाश सिंह को मिली लेकिन उसी दौरान उनका तबादला भी हो गया जिस वजह से यह विवेचना दारोगा हरी ओम प्रताप सिंह को स्थानांतरित कर दिया गया।

विभागीय सहकर्मी को बचाने के लिए दूसरे विवेचक ने भी कर दी मामले की लीपापोती 

चुकी पूर्व का विवेचक भी विभाग से जुड़ा था, लिहाजा दूसरे विवेचक हरी ओम प्रताप सिंह ने भी पुनर्विवेचना में लीपापोती कर मामले को रफा दफा कर दिया। विवेचना रिपोर्ट में हरी ओम प्रताप सिंह ने लिखा की मकान टूटने में 2 साल लगे है। और शिकायतकर्ता इस दौरान काफी समय बनारस में रहा भी है। जबकि आरोपी संजय सिंह आदि के द्वारा कभी भी मकान तोड़ने सम्बन्धी कार्य कभी नही किया गया। कुल मिलाकर भेलूपुर थाने की पुलिस ने चोरों को बचाने के लिए हर तरीके से अपना ईमान बेच दिया।  पीड़ित पक्ष आज भी न्याय की उम्मीद में पुलिस विभाग के चक्कर काट रहा है और पुलिस अभियुक्तों के पक्ष में न केवल सीना तानकर खड़ी दिखाई दे रही है बल्कि चोर और पुलिस की यारी वाली कहावत को चरितार्थ कर रही है। 

पैसों के लालच में दारोगा ने गिरवी रख दी ईमान

सूत्रों के अनुसार तत्कालीन दुगार्कुंड चौकी इंचार्ज शिवम श्रीवास्तव ने जब मुकदमे की विवेचना शुरू की तो इसकी जानकारी आरोपियों को हुई। सभी आरोपी रसूखदार और धन्नासेठ हैं। आरोपियों ने दारोगा शिवम श्रीवास्तव से संपर्क किया और पैसों की लालच देकर मुकदमे को निपटाने की पैरवी की। सूत्रों की माने तो मुकदमे को गलत साबित करने के लिए आरोपियों ने शिवम श्रीवास्तव के ईमान कि बोली लगा दी। भला पैसा किसको काटता है। मोटी रकम की लालच में दारोगा शिवम श्रीवास्तव का ईमान डगमगा गया। वो नोटों की गद्दी देखकर अपने न्याय की वर्दी को भी गंदा कर लिया। सूत्रों ने बताया कि इस दारोगा का ईमान खरीदने के लिए आरोपियों ने 3 लाख रुपए दिए। 

तबादले से एक दिन पहले लगा दी अंतिम रिपोर्ट 

चोरी के इस अनोखे मामले की विवेचना करने वाला दारोगा शिवम श्रीवास्तव इतना तेज निकला कि अपने तबादले से एक दिन पूर्व इस मामले में फाइनल रिपोर्ट लगाकर मामले को रफा दफा कर दिया। असल में इतनी तेजी इसलिए थी क्योंकि रसूखदारों ने दारोगा का ईमान खरीद लिया था, ऐसे में दारोगा जी की यह मजबूरी थी कि जिनका खाया उनसे निभाना तो बनता ही है और फिर जाते-जाते चोरी के आरोपियों के पक्ष में ईमानदारी प्रमाणपत्र लिखने में जरा भी देर नहीं किया। इसलिए उसने मामले में  45 दिन में और तबादले से एक दिन पहले ही आनन फानन में अंतिम रिपोर्ट लगा दी गयी।

45 दिन में ही लगा दी फाइनल रिपोर्ट

नियमत: किसी भी विवेचना के लिए 90 दिन का समय लिया जाता है। इन 90 दिनों के दौरान विवेचक घटना स्थल का निरीक्षण करता, आसपास के लोगों से पूछताछ करता है, साक्ष्य जुटाया जाता है, शिकायतकर्ता और आरोपी का बयान लिया जाता है फिर रिपोर्ट अथवा अंतिम रिपोर्ट तैयार कर थानाध्यक्ष को सौंपा जाता है। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि चंद्रभूषण सिंह के मामले में ऐसा कुछ नहीं किया गया। दारोगा शिवम श्रीवास्तव ने सारे नियम कानून से ऊपर जाकर बिना घटनास्थल पर गए, बिना दोनों पक्षों का बयान लिए मात्र 45 दिन में ही अंतिम रिपोर्ट यह कहकर लगा दी की कोई भी पुष्टिकारक साक्ष्य नहीं मिला। हकीकत यह है की दारोगा शिवम श्रीवास्तव ने विवेचना के दौरान न घटनास्थल पर जाने की जुर्रत की ना ही पूछताछ की, ना ही साक्ष्य संकलन करने की। इस मामले में विवेचक ने अभियुक्तों के प्रभाव में आकर आनन-फानन में ना ही वादी मुकदमा का 161 सीआरपीसी के तहत बयान लिया और ना ही घटना स्थल व गवाहों का परीक्षण किया और नियम कानून को ताक पर रखते हुये सीधे अंतिम रिपोर्ट प्रेषित कर दिया।