वाराणसी (रणभेरी): महाराजा चेतसिंह जिला अस्पताल के बाहर मंगलवार देर शाम उस समय अफरा-तफरी मच गई, जब प्रसव पीड़ा से कराह रही एक गर्भवती महिला ने सड़क किनारे नवजात को जन्म दे दिया। महिला के परिजनों ने अस्पताल के कर्मचारियों पर भर्ती न करने का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि महिला को उसके वनवासी समुदाय से होने की बात कहकर इलाज से मना किया गया। हालांकि अस्पताल प्रशासन ने इन आरोपों से अलग कारण बताया है। अधिकारियों के मुताबिक महिला का हीमोग्लोबिन बेहद कम था, जिसके चलते उसे उच्च चिकित्सा केंद्र के लिए रेफर किया गया था।
जोरई गांव की रहने वाली 20 वर्षीय रानी को मंगलवार शाम प्रसव पीड़ा शुरू होने पर परिजन सरकारी एंबुलेंस से जिला अस्पताल लेकर पहुंचे थे। आरोप है कि अस्पताल पहुंचने के बाद उसे भर्ती नहीं किया गया। परिजन महिला को लेकर वापस जाने लगे। इसी दौरान अस्पताल के मुख्य परिसर के बाहर उसकी प्रसव पीड़ा अचानक बढ़ गई और परिजनों को सड़क किनारे चादर की आड़ में प्रसव कराना पड़ा।
परिजनों ने लगाया गंभीर आरोप
प्रसूता के भाई विजय कुमार का आरोप है कि अस्पताल में मौजूद स्टाफ नर्स नीलम मौर्या ने महिला के मुसहर समुदाय से होने का हवाला देते हुए उसे भर्ती करने से इनकार कर दिया। सड़क पर प्रसव की सूचना मिलने के बाद स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों में हड़कंप मच गया।
मामले की जानकारी मिलने पर सीएमओ डॉ. एसके चक मौके पर पहुंचे। तब तक परिजन जच्चा-बच्चा को लेकर घर जा चुके थे। सीएमओ स्वास्थ्य विभाग की टीम के साथ उनके घर पहुंचे और दोनों को वापस जिला अस्पताल लाया गया। इसके बाद महिला और नवजात को इमरजेंसी में भर्ती कराया गया तथा उपचार शुरू कराया गया।
कम हीमोग्लोबिन का दिया गया हवाला
सीएमओ डॉ. एसके चक के मुताबिक रानी सोमवार को भी जिला अस्पताल आई थी। जांच में उसका हीमोग्लोबिन करीब पांच ग्राम पाया गया था। गंभीर एनीमिया की स्थिति को देखते हुए उसे मिर्जापुर मंडलीय अस्पताल रेफर किया गया था। परिजनों के अनुसार महिला वहां से वापस लौट आई।
मंगलवार को दोबारा अस्पताल पहुंचने पर चिकित्सकों ने उसकी स्थिति देखी और कम हीमोग्लोबिन के कारण उसे बीएचयू रेफर करने की सलाह दी। स्वास्थ्य अधिकारियों का कहना है कि परिजन अधिक पढ़े-लिखे नहीं थे और 102 एंबुलेंस की सुविधा के लिए संपर्क नहीं कर सके। इसी दौरान अस्पताल से बाहर निकलते समय महिला ने सड़क पर बच्चे को जन्म दे दिया।
स्वास्थ्यकर्मियों की भूमिका पर उठे सवाल
घटना के बाद अस्पताल की व्यवस्था और स्वास्थ्यकर्मियों की भूमिका पर भी सवाल खड़े हुए। लोगों का कहना था कि यदि महिला को रेफर किया गया था तो अस्पताल की ओर से उसके लिए एंबुलेंस की व्यवस्था कर उसे सुरक्षित तरीके से रवाना किया जाना चाहिए था।
प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक सड़क पर प्रसव की स्थिति करीब 20 से 25 मिनट तक बनी रही। इस दौरान अस्पताल के बाहर से लेकर परिसर तक लोगों की भीड़ जुट गई। लेबर रूम की इमरजेंसी सेवा को लेकर भी सवाल उठे।
सीएमओ ने दिए जांच के आदेश
मामले को गंभीरता से लेते हुए सीएमओ ने चार सदस्यीय जांच समिति गठित कर दी है। समिति में एसीएमओ डॉ. ओपी शुक्ला, डिप्टी सीएमओ डॉ. आशीष सरोज, भदोही सीएचसी की महिला रोग विशेषज्ञ डॉ. शालिनी पाठक समेत एक अन्य अधिकारी को शामिल किया गया है।
सीएमओ ने कहा कि जांच रिपोर्ट 24 घंटे के भीतर आने की उम्मीद है। जांच में किसी कर्मचारी की लापरवाही सामने आती है तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि महिला को रेफर करते समय स्वास्थ्यकर्मियों को उसकी सहायता करनी चाहिए थी और एंबुलेंस की व्यवस्था करानी चाहिए थी।
फिलहाल महिला और उसका नवजात जिला अस्पताल में चिकित्सकों की निगरानी में हैं। अधिकारियों के मुताबिक दोनों की स्थिति स्थिर है। प्रसूता का उपचार जारी है और उसकी स्वास्थ्य स्थिति में सुधार के बाद ही अस्पताल से छुट्टी देने का निर्णय लिया जाएगा।
