- यूट्यूबर्स और डिजिटल क्रिएटर्स बन रहे आज के युवा पीढ़ी के रोल मॉडल
- वीडियो से आसान सीख, लेकिन सच-झूठ की पहचान मुश्किल, ज्ञान के साथ बढ़ रहा भ्रम का खतरा
- रील्स और शॉर्ट्स ने घटाया ध्यान, बिना प्रमाणिकता वाले एक्सपर्ट दे रहे सलाह, युवा ले रहे जोखिम भरे फैसले
वाराणसी (रणभेरी सं.)। मोबाइल स्क्रीन पर कुछ सेकेंड में दुनिया भर की जानकारी मिल जाना आज की डिजिटल पीढ़ी की नई हकीकत बन चुकी है। यह पीढ़ी अब पारंपरिक किताबों और क्लासरूम से आगे बढ़कर यूट्यूब जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म को अपना सबसे बड़ा ‘गुरु’ मान रही है। पढ़ाई से लेकर करियर, हेल्थ, फिटनेस और लाइफस्टाइल तक हर सवाल का जवाब अब वीडियो के जरिए खोजा जा रहा है।
यूट्यूब ने सीखने की प्रक्रिया को बेहद आसान और सुलभ बना दिया है। गणित के कठिन सवाल, कोडिंग की बारीकियां या इंटरव्यू की तैयारी, हर विषय पर हजारों वीडियो उपलब्ध हैं। बीएचयू के छात्र रोहित बताते हैं कि कई टॉपिक्स क्लास में समझ नहीं आते, लेकिन यूट्यूब पर अलग-अलग शिक्षकों के वीडियो देखकर आसानी से क्लियर हो जाते हैं। यह अनुभव सिर्फ एक छात्र का नहीं, बल्कि देशभर के लाखों युवाओं का है।
हालांकि, इस डिजिटल क्रांति के साथ एक बड़ा खतरा भी सामने आ रहा है। यूट्यूब पर कंटेंट की भरमार है, लेकिन यह तय करने का कोई सख्त सिस्टम नहीं है कि कौन-सी जानकारी सही है और कौन-सी गलत। खासकर हेल्थ, फाइनेंस और करियर जैसे संवेदनशील विषयों पर बिना किसी प्रमाणिकता के वीडियो तेजी से वायरल हो रहे हैं।

कई लोग बिना डिग्री या अनुभव के खुद को एक्सपर्ट बताकर सलाह दे रहे हैं, जिसे युवा आसानी से सच मान लेते हैं। यही वजह है कि गलत फैसलों का खतरा बढ़ता जा रहा है। गलत निवेश, अनियमित डाइट प्लान या करियर से जुड़े गलत निर्णय युवाओं को नुकसान पहुंचा सकते हैं। वाराणसी के भरलाईन निवासी छात्र अथर्व रवि दूबे बताते हैं कि उन्होंने यूट्यूब से जिम और डाइट प्लान फॉलो किया, लेकिन बाद में डॉक्टर ने इसे उनके लिए नुकसानदेह बताया।
दूसरी ओर, यूट्यूब शॉर्ट्स और इंस्टाग्राम रील्स ने कंटेंट देखने की आदत को पूरी तरह बदल दिया है। अब युवा लंबी और गहराई वाली जानकारी के बजाय 30 से 60 सेकेंड के छोटे वीडियो में ही सब कुछ समझ लेना चाहते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, इससे ध्यान केंद्रित करने की क्षमता पर असर पड़ रहा है। जानकारी तो मिलती है, लेकिन उसमें गहराई की कमी होती है, जिससे कई बार अधूरी समझ के आधार पर फैसले लिए जाते हैं।
यूट्यूबर्स और डिजिटल क्रिएटर्स आज की युवा पीढ़ी के रोल मॉडल बन चुके हैं। उनके फैशन, फिटनेस, लाइफस्टाइल और करियर से जुड़े वीडियो तेजी से ट्रेंड बनते हैं और युवा उन्हें फॉलो करने लगते हैं। लेकिन यहां भी पारदर्शिता का अभाव चिंता का विषय है। कई वीडियो स्पॉन्सर्ड होते हैं या ब्रांड प्रमोशन के तहत बनाए जाते हैं, जिनमें पूरी जानकारी नहीं दी जाती। ऐसे में युवा इन सुझावों को वास्तविक मानकर अपनाते हैं और कई बार नुकसान उठाते हैं।
डिजिटल दुनिया की चमक-दमक का असर युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर भी साफ दिखाई दे रहा है। परफेक्ट लाइफ दिखाने वाले वीडियो, सफलता की कहानियां और लग्जरी लाइफस्टाइल युवाओं में तुलना की भावना पैदा कर रहे हैं। छात्र बताते हैं कि सोशल मीडिया देखने के बाद कई बार लगता है कि बाकी लोग उनसे ज्यादा सफल हैं, जिससे खुद के प्रति नकारात्मक सोच बढ़ती है।
वाराणसी के स्कूलों और कॉलेजों में पढ़ने वाले छात्रों के बीच यह ट्रेंड तेजी से बढ़ रहा है। पढ़ाई और स्किल डेवलपमेंट के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म पर निर्भरता बढ़ती जा रही है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि बिना क्रॉस-चेक के जानकारी अपनाना खतरनाक हो सकता है।
