काशी में जलती चिताओं के बीच नगर वधुओं ने किया डांस, महाश्मशान में नृत्य की थाप पर घुंघरुओं ने लगाई मुक्ति की गुहार, बोलीं- कलंकित जीवन से मुक्ति दें

काशी में जलती चिताओं के बीच नगर वधुओं ने किया डांस, महाश्मशान में नृत्य की थाप पर घुंघरुओं ने लगाई मुक्ति की गुहार, बोलीं- कलंकित जीवन से मुक्ति दें

वाराणसी (रणभेरी): विश्व की सबसे प्राचीन नगरी काशी आज भी अपने परंपराओं  को सहेजे चली आ रही है। काशी की कई ऐसी अनोखी और अद्भुत परमार है जो आपको सिर्फ इस शिव की नगरी में ही देखने को मिलेगा, इन्हीं परंपराओं में एक है काशी के महाश्मशान मणिकर्णिका घाट पर शुक्रवार रात नगर वधुओं ने डांस किया। एक ओर चिताएं जल रही थीं तो दूसरी तरफ डांस चल रहा था। पूरी रात लोग महाश्मशान में बैठकर उत्साह के साथ डांस देखते रहे।
वधुओं ने बाबा को रिझाने के लिए भजन गाए। उन्होंने बाबा से वरदान मांगा कि अगले जन्म में हमें नगर वधु न बनना पड़े। इस कलंकित जीवन से मुक्ति देना। बनारस की यह परंपरा लगभग 350 वर्षों से भी ज्यादा पुरानी है।

 शुक्रवार रात बाबा मसाननाथ का दरबार भव्य सजा। गुलाब, गेंदा, बेला, रजनीगंधा, चमेली के फूलों से बाबा का श्रृंगार किया गया। बाबा को भोग लगाया गया और भव्य आरती की गई। इसके बाद बाबा मसाननाथ के सामने नगर वधुओं का मंच सजा। पूरी रात नगर वधुओं ने डांस किया। दुर्गा दुर्गति नाशिनी...डिमिग डिमिग डमरू कर बाजे...जैसे भजन भी गाए।

मान्यताओं के अनुसार, नवरात्रि की सप्तमी तिथि को 400 साल पुरानी यह परंपरा निभाई जाती है। चैत्र नवरात्रि की सप्तमी पर यह कार्यक्रम हर साल होता है। इसमें वाराणसी के आसपास के जिलों के अलावा कई राज्यों से भी नगर वधुएं यहां पहुंचती हैं। खास बात यह है कि किसी भी नगर वधु को आमंत्रित नहीं किया जाता है।

इस अद्भुत आयोजन के बारे में महाश्मशान नाथ मंदिर सेवा समिति के अध्यक्ष और आयोजक चैनू प्रसाद गुप्ता ने बताया कि यह परंपरा काफी पुरानी है। कहा जाता है कि राजा मानसिंह द्वारा जब बाबा के इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया गया था, तब मंदिर में संगीत के लिए कोई भी कलाकार आने को तैयार नहीं हुआ था. हिन्दू धर्म में हर पूजन या शुभ कार्य में संगीत का कार्यक्रम जरूर होता है। 

इसी कार्य को पूर्ण करने के लिए जब कोई तैयार नहीं हुआ तो राजा मानसिंह काफी दुखी हुए। यह संदेश उस जमाने में धीरे-धीरे पूरे नगर में फैलते हुए काशी के नगर वधुओं तक भी जा पहुंचा। नगर वधूओं ने डरते-डरते अपना यह संदेश राजा मानसिंह तक भिजवाया कि यह मौका अगर उन्हें मिलता है, तो वह अपने आराध्य संगीत के जनक नटराज महाश्मसानेश्वर को अपनी भावाजंलि प्रस्तुत कर सकती हैं।