भावों के मृदुल स्वर से मचल उठीं जाह्नवी की लहरें

भावों के मृदुल स्वर से मचल उठीं जाह्नवी की लहरें

वाराणसी (रणभेरी सं.)। जाह्नवी के तट अस्सी घाट पर मंगलवार को गंगा पूजन के साथ ही विधिवत गंगा महोत्सव कार्यक्रम का आगाज हुआ। उत्तर प्रदेश के स्टांप एवं न्यायालय पंजीयन शुल्क राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) रविंद्र जायसवाल ने दीप प्रज्वलित कर गंगा महोत्सव के सांस्कृतिक कार्यक्रम का उद्घाटन किया। इसके बाद जब 'हे काशी के बसैया, हे भांग के छनैया, हे गंग के धरैया, तुम भोलेनाथ हो...' राग देस में पद्मभूषण पं. साजन मिश्र ने जब 'काशी गंगा महोत्सव : 2024 के मंच से आलाप दिया तो उनकी पहली ही प्रस्तुति ने आस्था, संस्कृति व काशी की आध्यात्मिकता को संघनीभूत कर मानो उसे श्रव्य स्वरूप में दर्शक-श्रोताओं के समक्ष उपस्थित कर दिया। 

आयोजन की प्रथम निशा के प्रथम सितारे के रूप में पं. मिश्र ने अपने सुपुत्र पं. स्वरांश के साथ युगलबंदी कर राग पीलू में 'अब कृपा करो श्रीराम दुख टारो...' व राग नट भैरव में 'चलो मन वृंदावन की ओर..' प्रस्तुत कर काशी के सांगीतिक वैशिष्ट्य को साकार कर दिया। फिर तो एक के बाद एक देश के अनेक हिस्सों से पधारे कलाकार अपनी प्रस्तुति देते गए और मां जाह्नवी की लहरें सुर, लय ताल के भावों पर मचल-मचल उत्ताल भरती रहीं। स्वरांश मिश्र ने स्वरचित अघोरी चालीसा 'हाथ कपाल, गले मुंड की माल..' प्रस्तुत कर वातावरण में रोमांच भर दिया। अर्धशीश पर शशि उजियारा, अर्धशीश गंगा की धारा, अर्ध अंग चंदन लपटाए, अर्धभाग सिंदूर सुहाए, जय-जय अर्धागपति जय-जय...' से अर्धनारीश्वर भगवान शिव की आराधना करते हुए अपनी प्रस्तुतिका शुभारंभ किया. इसके पश्चात दक्ष यज्ञ प्रसंग, 'ओम हरि ओम जय शंकर कैलाशपति...' के माध्यम से मां पार्वती द्वारा भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए की गई आराधना, असुरों का विनाश करती महाकाली, व अंत में सीता सती के प्रसंगों की रोमांचकारी प्रस्तुति देते हुए ध्रुपद के बोल 'शिवा शिवा...' से विराम दिया. बीएचयू संगीत विभाग की डॉ. सुप्रिया शाह ने मैहर घराना शैली का प्रतिनिधित्व करते हुए सितारवादन किया। उन्होंने राग वागेश्वरी में मध्य ताल द्रुत गति झाला से आरंभ किया। राग मिश्र पीलू में धुन बजाई. तबले पर साथ पं. विभाष महाराज ने दिया।

काशीरस बैंड ने जमाया बनारस घराने का रंग

काशी रस बैंड ग्रुप ने अपनी प्रस्तुति से मंच पर बनारसी रंग  जमाते हुए सबको झुमा दिया। पं. अंशुमान महाराज के सरोद वादन, डा. राकेश कुमार की बांसुरी, अनीश मिश्र की सारंगी, उदयशंकर मिश्र का तबला, वैभव रामदास के पखावज ने मिलकर बनारस घराने के पारंपरिक भीम पलाशी' बांध के पिरितिया के डोर..' रागम मिश्र पहाड़ी में आलाप के बाद एक साथ बंदिश का तराना तिहाई में जब बजाया तो बनारसी घाटों की पूरी मस्ती संगीत में छलक पड़ी। पं. अंशुमान महाराज ने बताया कि फिरोजाबाद, आगरा, लखनऊ महोत्सवों के अलावा उनका बैंड ग्रुप फ्रांस, बेल्जियम, जर्मनी, नीदरलैंड, स्विट्जरलैंड में अब तक यह प्रस्तुति दे चुके हैं।

संकल्पों के साथ शुभारंभ

जिला प्रशासन, संस्कृति व पर्यटन विभाग के संयुक्त तत्वावधान में तीन दिवसीय महोत्सव का शुभारंभ स्टांप शुल्क एवं पंजीयन मंत्री रवींद्र जायसवाल, एमएलसी हंसराज विश्वकर्मा, सीडीओ हिमांशु नागपाल, गीता शास्त्री, सुबह- ए-बनारस के रत्नेश वर्मा, पं. प्रमोद मिश्र, एडीएम प्रोटोकाल आलोक वर्मा, उपनिदेशक पर्यटन आरके रावत ने दीप जलाकर किया। गंगा सेवा समिति के तत्वावधान में दैनिक गंगा आरती, राजेंद्र उपाध्याय के नेतृत्व में शंखध्वनि व डमरू वादन किया गया। औपचारिक उद्घाटन के पूर्व काशी सांसद संस्कृति महोत्सव के पिछले वर्ष के कलाकारों ने पं. अंशुमान महाराज के नेतृत्व में प्रस्तुतियां दीं।

गंगा की लहरें खुद ब खुद में संगीत है-रविंद्र जायसवाल

जाह्नवी के तट अस्सी घाट पर मंगलवार को गंगा पूजन के साथ ही विधिवत गंगा महोत्सव कार्यक्रम का आगाज हुआ। उत्तर प्रदेश के स्टांप एवं न्यायालय पंजीयन शुल्क राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) रविंद्र जायसवाल ने दीप प्रज्वलित कर गंगा महोत्सव के सांस्कृतिक कार्यक्रम का उद्घाटन किया। इस अवसर पर उन्होंने लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि गंगा के तट पर प्रतिवर्ष आयोजित होने वाला गंगा महोत्सव कार्यक्रम अब काशी ही नहीं बल्कि देश-दुनिया के लोगों का कार्यक्रम बन चुका है। लोग इस कार्यक्रम का इंतजार करते रहते हैं। मंत्री रविंद्र जायसवाल ने विशेष रूप से जोर देते हुए कहा कि संगीत के सरगम का उद्गम यदि गंगा की लहरों से होना कहा जाए, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। गंगा की लहरों से ही वाद्य, नृत्य एवं नाट्य बना और सांस्कृतिक कलाकारों का वास भी गंगा के किनारे बना। गंगा की लहरें खुद ब खुद में संगीत है। उन्होंने मां गंगा का गुणगान करते हुए कहा कि यह कोई साधारण नदी नहीं, बल्कि मानव सभ्यता की जीवन रेखा है। अपने उद्गम स्थल से 2323 किलोमीटर की यात्रा तय कर गंगा नदी जहां-जहां से गुजरी, उनके किनारे ही लोग बसे और मानव सभ्यता का विकास हुआ। लोगों को रोजी-रोजगार भी मिला। काशी के गंगा घाटों की छटा पूरी दुनिया में विख्यात है