जर्जर मकान ने छीना पूरा परिवार, अकेला बचा अमन छह अपनों की चिताओं को दिया मुखाग्नि

जर्जर मकान ने छीना पूरा परिवार, अकेला बचा अमन छह अपनों की चिताओं को दिया मुखाग्नि

(रणभेरी): परिवार के छह सदस्यों को एक साथ खोने का दर्द क्या होता है, इसे प्रतापगढ़ के महुली गांव के अमन श्रीवास्तव से बेहतर शायद ही कोई बता सके। जिस परिवार के साथ अमन ने बेहतर भविष्य के सपने देखे थे, बुधवार की रात एक हादसे में वही पूरा परिवार उससे हमेशा के लिए बिछड़ गया। गुरुवार को प्रयागराज के फाफामऊ घाट पर अमन ने अपने माता-पिता समेत परिवार के छह सदस्यों का अंतिम संस्कार किया। एक के बाद एक छह चिताओं को मुखाग्नि देते समय वह कई बार भावुक होकर बेसुध हो गया।

अमन ने बताया कि वह पिछले कई वर्षों से सरकारी आवास की उम्मीद लगाए बैठा था। उसका सपना था कि पक्का घर मिलने के बाद छोटे भाई की शादी धूमधाम से करेगा और परिवार को जर्जर मकान से निकालकर सुरक्षित जिंदगी देगा। लेकिन घर मिलने से पहले ही हादसे ने उसका पूरा परिवार छीन लिया।

बारिश के बीच ढह गईं मकान की दो छतें

महुली गांव में बुधवार रात करीब दो बजे लगातार हो रही बारिश के बीच प्रमोद श्रीवास्तव का परिवार पुराने मकान के एक कमरे में सो रहा था। मकान काफी समय से जर्जर हालत में था। इसी दौरान अचानक मकान की दो छतें भरभराकर नीचे आ गिरीं। हादसा इतना अचानक हुआ कि कमरे में सो रहे लोगों को संभलने तक का मौका नहीं मिला।

जर्जर मकान ने छीना पूरा परिवार, अकेला बचा अमन छह अपनों की चिताओं को दिया मुखाग्नि

छत और मलबे के नीचे परिवार के कई सदस्य दब गए। हादसे के बाद गांव में चीख-पुकार मच गई। स्थानीय लोगों ने राहत और बचाव का प्रयास शुरू किया। लेकिन जब तक मलबा हटाया गया, तब तक परिवार के छह लोगों की जान जा चुकी थी। इस हादसे में अमन परिवार का इकलौता सदस्य बचा।

वर्षों से पक्के मकान की उम्मीद, दो बार आवेदन हुआ निरस्त

अमन के मुताबिक, उनका परिवार लंबे समय से जर्जर मकान में रहने को मजबूर था। बारिश के दिनों में छत से पानी टपकता था और दीवारों तथा छत का प्लास्टर भी अक्सर टूटकर गिरता रहता था। इसके बावजूद आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि परिवार तुरंत नया मकान बनवा सके।

अमन ने बताया कि उसने करीब पांच-छह साल में सरकारी आवास के लिए तीन बार आवेदन किया। इनमें से दो बार आवेदन निरस्त हो गया। इस बीच प्रधानमंत्री आवास योजना (2.0) के तहत उसका आवेदन स्वीकृत होने की जानकारी मिली थी। अधिकारियों की ओर से उसे जल्द खाते में राशि आने की उम्मीद बताई गई थी।

अमन को भरोसा था कि सरकारी सहायता मिलने के बाद परिवार के लिए सुरक्षित घर बनाया जा सकेगा। लेकिन खाते में रकम पहुंचने से पहले ही वह हादसा हो गया, जिसने उसके परिवार की पूरी तस्वीर बदल दी।

विधायक ने कहा- आवास के आवेदन निरस्त होने की होगी जांच

हादसे के बाद शुक्रवार को सदर विधायक राजेंद्र मौर्य ने अमन से मुलाकात की और उसे सांत्वना दी। विधायक ने घटना को बेहद दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण बताया।

उन्होंने कहा कि यदि परिवार ने सरकारी आवास के लिए आवेदन किया था और उसे निरस्त किया गया, तो इसकी वजह की जानकारी जुटाई जाएगी। उन्होंने जिलाधिकारी से बातचीत कर पूरे मामले की जांच कराने की बात कही। साथ ही जिले में जर्जर भवनों को चिन्हित करने के लिए सर्वे कराने और जरूरतमंद परिवारों तक सरकारी मदद पहुंचाने की बात भी कही।

छह चिताओं के सामने अकेला रह गया अमन

गुरुवार शाम करीब साढ़े चार बजे पोस्टमार्टम की प्रक्रिया पूरी होने के बाद परिवार के सभी शवों को प्रयागराज के फाफामऊ स्थित गंगा घाट के विद्युत शवदाह गृह ले जाया गया।

यहां परिवार के चार सदस्यों का अलग-अलग अंतिम संस्कार किया गया, जबकि दोनों मासूम बच्चों का अंतिम संस्कार एक साथ हुआ। अमन ने कांपते हाथों से अपने छह परिजनों को अंतिम विदाई दी।

बताया गया कि अंतिम संस्कार के दौरान अमन कई बार अपने होश खो बैठा। वहां मौजूद रिश्तेदारों और परिजनों ने उसे संभाला। जिस युवक ने कुछ समय पहले परिवार को बेहतर भविष्य देने का सपना देखा था, उसी को एक ही दिन में अपने छह करीबियों की अंतिम विदाई देनी पड़ी।

चचेरे भाई ने की सरकारी नौकरी और मुआवजे की मांग

अमन के चचेरे भाई अंकुर श्रीवास्तव ने सरकार से परिवार की मदद करने की अपील की है। उन्होंने अमन को सरकारी नौकरी देने के साथ उचित आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने की मांग की है।

अंकुर ने कहा कि अमन के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती अपनी जिंदगी को दोबारा संभालने की है। परिवार में अब उसका साथ देने वाला कोई नहीं बचा है। रिश्तेदार और परिवार के अन्य सदस्य उसे इस सदमे से बाहर निकालने और आगे की जिंदगी शुरू करने में हरसंभव मदद करेंगे।

मुंबई में नौकरी छोड़कर गांव लौटे थे प्रमोद

परिजनों के अनुसार, प्रमोद श्रीवास्तव करीब डेढ़ साल पहले मुंबई से अपने गांव लौटे थे। वह पहले मेडिकल क्षेत्र से जुड़ी मार्केटिंग की नौकरी करते थे। स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों के कारण उन्होंने मुंबई छोड़ने का फैसला किया।

गांव वापस आने के बाद परिवार की आमदनी चलाने के लिए उन्होंने ई-रिक्शा चलाना शुरू किया। इसके अलावा सड़क किनारे तख्त लगाकर सब्जी बेचने का काम भी करते थे। बड़ा बेटा अमन महुली मंडी में मुनीम के तौर पर काम करता था।

परिवार की आर्थिक स्थिति धीरे-धीरे सुधारने की कोशिश चल रही थी। करीब डेढ़ महीने पहले ही प्रमोद ने नया ई-रिक्शा खरीदा था। उन्हें उम्मीद थी कि इससे आमदनी बढ़ेगी और परिवार जल्द ही अपना पक्का मकान बनवा सकेगा।

तीन बिस्वा जमीन बेचकर जुटाए थे 25 लाख रुपये

बताया गया कि परिवार के पास करीब 13 बिस्वा जमीन थी। लगभग एक वर्ष पहले प्रमोद ने तीन बिस्वा जमीन बेचकर करीब 25 लाख रुपये जुटाए थे। उनका उद्देश्य नया मकान बनाना था, लेकिन परिवार की दूसरी जरूरतों और आर्थिक परिस्थितियों के कारण मकान का निर्माण शुरू नहीं हो सका।

जमीन का करीब 10 बिस्वा हिस्सा परिवार के पास बचा था। इसी बीच सरकारी आवास की उम्मीद भी बनी हुई थी। परिवार को भरोसा था कि किसी तरह नया घर बन जाएगा और जर्जर मकान से छुटकारा मिल जाएगा।

बड़े मकान में सिर्फ एक कमरा था रहने लायक

पुराना मकान आकार में बड़ा था, लेकिन लंबे समय से रखरखाव नहीं होने के कारण उसकी हालत बेहद खराब हो चुकी थी। परिवार ने पूरे मकान के बजाय सिर्फ एक कमरे को रहने लायक बनाया था। इसी कमरे में तीन तख्त थे और रात में परिवार के सदस्य वहीं सोते थे।

कमरे के भीतर ही पूजा स्थल बनाया गया था। गर्मी से राहत के लिए परिवार ने एसी भी लगा रखा था। बाहर से मकान भले ही बड़ा दिखाई देता था, लेकिन परिवार की मजबूरी थी कि वह जर्जर इमारत के इसी हिस्से में जिंदगी गुजार रहा था।

10 अगस्त को मुंबई जाने वाले थे प्रमोद

परिवार के मुताबिक, प्रमोद दोबारा मुंबई जाने की तैयारी में थे। उन्होंने 10 अगस्त का टिकट भी करा लिया था। हादसे वाले दिन ही उन्होंने अमन से कहकर टिकट कैंसिल करा दिया था।

किसी को अंदाजा नहीं था कि मुंबई जाने की तैयारी कर रहे प्रमोद और उनका परिवार अगले ही कुछ घंटों में इस दुनिया से विदा हो जाएगा। अमन के लिए अब वह घर, जिसमें उसने परिवार के साथ भविष्य के सपने देखे थे, सिर्फ एक दर्दनाक याद बनकर रह गया है।

परिवार के लोगों का कहना है कि अमन लंबे समय से अपने माता-पिता और भाई-बहनों के बेहतर भविष्य के लिए मेहनत कर रहा था। उसे उम्मीद थी कि सरकारी आवास मिलने के बाद परिवार की मुश्किलें कम होंगी। लेकिन घर बनने से पहले ही जर्जर मकान की छत ने उसके परिवार को हमेशा के लिए उससे छीन लिया।

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