2 हजार से 20 हजार रुपये तक की गणेश प्रतिमाएं, 2 लाख रुपये तक के चांदी के गहनों की मांग; विदेशों से मिल रहे व्यक्तिगत ऑर्डर
वाराणसी (रणभेरी): धनतेरस पर बाजार में सोने-चांदी की खरीदारी के बीच बनारस की पारंपरिक गुलाबी मीनाकारी भी लोगों को आकर्षित कर रही है। इस बार गणेश प्रतिमाओं, श्रीमूर्तियों और चांदी के आभूषणों की मांग बढ़ी है। खास बात यह है कि बनारस की यह सदियों पुरानी कला अब देश ही नहीं, बल्कि अमेरिका, कनाडा, जापान और जर्मनी तक अपनी पहचान बना रही है। विदेशों में रहने वाले ग्राहक सीधे कारीगरों से संपर्क कर अपनी पसंद के उत्पाद तैयार करवा रहे हैं।
गुलाबी मीनाकारी के कारीगर रवीश कुमार विश्वकर्मा के मुताबिक, महाराष्ट्र, गुजरात और मध्यप्रदेश समेत देश के कई राज्यों से उन्हें लगातार ऑर्डर मिल रहे हैं। विदेशी ग्राहक भी व्यक्तिगत तौर पर संपर्क कर गणपति की प्रतिमाएं और चांदी के गहने बनवा रहे हैं। वे किसी विदेशी शोरूम को उत्पादों की आपूर्ति नहीं करते, बल्कि ग्राहकों की मांग के अनुसार सामान तैयार कर सीधे भेजते हैं। पहले विदेशों से इक्का-दुक्का ऑर्डर मिलते थे, लेकिन अब इनकी संख्या लगातार बढ़ रही है। रवीश के अनुसार, इस महीने करीब 20 लाख रुपये के गहने ग्राहकों को दिए जा चुके हैं।
गणेश प्रतिमाओं से लेकर लाखों के गहनों तक की रेंज
धनतेरस के लिए बाजार में गुलाबी मीनाकारी के उत्पादों की अलग-अलग रेंज उपलब्ध है। गणेश प्रतिमाओं की कीमत 2 हजार से 20 हजार रुपये तक है, जबकि चांदी के मीनाकारी वाले गहने 2 हजार से लेकर 2 लाख रुपये तक में मिल रहे हैं। पारंपरिक डिजाइन के साथ आधुनिक कलाकारी भी ग्राहकों को आकर्षित कर रही है। खासकर गहनों के सामने वाले हिस्से पर की गई गुलाबी मीनाकारी को लोग पसंद कर रहे हैं।
पीएम मोदी ने कमला हैरिस को भेंट किया था शतरंज सेट
बनारस की गुलाबी मीनाकारी को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने में रवीश कुमार विश्वकर्मा के बनाए उत्पादों की भी अहम भूमिका रही है। उनके हाथों से तैयार गुलाबी मीनाकारी का शतरंज सेट प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिका की तत्कालीन उपराष्ट्रपति कमला हैरिस को भेंट किया था। वहीं, जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान उनके बनाए गुलाबी मीनाकारी के ब्रोच को अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन को उपहार में दिया गया था। इसके अलावा मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री समेत कई प्रतिष्ठित हस्तियों को भी इस कला से बने उत्पाद भेंट किए जा चुके हैं।
कारीगर का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उपहार के रूप में बनारस की कला का पहुंचना स्थानीय शिल्पकारों के लिए गर्व की बात है। इससे गुलाबी मीनाकारी को नई पहचान मिल रही है और विदेशी ग्राहकों की रुचि भी बढ़ रही है।
फ्रांस की कलाकार ने समझी रंगों और आग की कारीगरी
बनारस की गुलाबी मीनाकारी को देखने पहुंचीं फ्रांस की कलाकार सिलेमिस्ट भी इस कला से प्रभावित हुईं। उन्होंने बताया कि यह कला उनकी अपनी कला से काफी मिलती-जुलती है। इसमें भी पहले रंग भरे जाते हैं और फिर आग की मदद से उन्हें पकाया जाता है। रंग भरने और उन्हें आग में तैयार करने की पूरी प्रक्रिया उन्हें काफी रोचक लगी। उन्होंने बनारस की पारंपरिक कलाकारी की सराहना की।
मुगलकाल में गहनों के पिछले हिस्से से हुई शुरुआत
रवीश कुमार विश्वकर्मा के मुताबिक, गुलाबी मीनाकारी की शुरुआत मुगलकाल में हुई थी। उस दौर में कुंदन से जड़े हार के पिछले हिस्से सादे हुआ करते थे। महारानियों ने गहनों के पिछले हिस्से को भी कलात्मक बनाने की इच्छा जताई। इसके बाद आभूषणों के पीछे मीनाकारी करने की परंपरा शुरू हुई।
इस कला में शीशे को पिघलाकर उसमें अलग-अलग रंगों के ऑक्साइड मिलाए जाते हैं। इससे रंग तैयार होते हैं। इसके बाद ब्रश की मदद से सोने और चांदी की प्लेट पर बारीक डिजाइन बनाए जाते हैं। तैयार डिजाइन को आग में तपाया जाता है, जिससे रंग धातु पर स्थायी रूप से जम जाते हैं।
समय के साथ गुलाबी मीनाकारी में भी बदलाव आया है। पहले जहां यह आभूषणों के पिछले हिस्से तक सीमित थी, वहीं अब गहनों के सामने वाले हिस्से पर भी इसका इस्तेमाल हो रहा है। पारंपरिक हुनर और नए डिजाइनों का यह मेल धनतेरस पर बनारस की गुलाबी मीनाकारी को बाजार में खास आकर्षण बना रहा है।
