- पूर्वांचल की आतिशबाजी की सबसे बड़ी मंडी मानी जाती थी दालमंडी
- दीपावली पर सबसे ज्यादा हुआ करती थी दालमंडी में भीड़, अब नहीं रही वह रौनक
- कभी यहां सजती थी संगीत की महफिलें, पटाखे से लेकर सुई-धागा डेकोरेशन के सामानों की खूब होती थी बिक्री
राधेश्याम कमल
वाराणसी (रणभेरी)। दीपावली पर दालमंडी की गलियां बहुत याद आयी। पूर्वांचल की सबसे बड़ी दालमंडी में सुई से लेकर धागा तक हर चीजें मिला करती थीं। दीपावली पर तो इस दालमंडी में खरीदारी के लिए इतनी भीड़ जुटती थी कि बस कुछ पूछिए मत। दिवाली पर घर को सजाना है तो हर कोई सजावटी सामानों की खरीदारी के लिए दालमंडी का रूख लेता था। यहां पर सजावटी सामान फुटकर के साथ ही थोक भाव में भी मिलते थे। दिवाली के आते ही दालमंडी की गलियों में अतिशबाजी की दुकानें सज जाया करती थीं। हालांकि इनमें कुछ दुकानें लाइसेंसी होती थी तो कईयों के पास कोई भी लाइसेंस नहीं होता था। ऐसे में दिवाली के वक्त दालमंडी में पुलिस का छापा पड़ता था जिसमें पटाखों का जखीरा पकड़ा जाता था।
आज दिवाली पर दालमंडी की लोगों को खूब याद आ रही है। जहां कभी भारी चहल-पहल-भारी भीड़ हुआ करती थी आज वहां सर्वत्र दालमंडी से लेकर नईसड़क तक सड़कों पर गिट्टियों का अंबार है। सड़कों पर पानी बह रहा है। सड़कों को समतल करने के लिए बड़ी बड़ी मशीनों का आवागमन जारी है। फिलहाल अभी तक इसे चालू नहीं किया गया है। लेकिन दालमंडी के नये अवतार को लेकर हर किसी के बीच इसकी चर्चा जारी है। चौक थाने के बगल से होकर गुजरते समय अक्सर लोग दालमंडी मोड़ पर खड़े होकर इसकी चर्चा करते नजर आते हैं।

नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद शहर में कई योजनाएं आयी। इनमें रोपवे- सिग्नेचर ब्रिज आदि कई हैं। लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा अगर किसी की हुई या हो रही है तो वह पूर्वांचल की सबसे बड़ी दालमंडी की है। जो अब नये अवतार में अवतरित होने जा रही है। दालमंडी वही इलाका है जो कभी नगर वधुओं के लिए मशहूर था। यहां की गलियों से होकर गुजरने पर घुंघरुओं की आवाजें एवं तबले की थाप सुनायी पड़ती थी। यह इलाका कई कारोबारियों का पनाहगार भी था। बाद में नगर वधुएं यहां से अन्यत्र चली गई। दालमंडी में पूरे पूर्वांचल से हजारों लोग यहां आकर अपनी जरुरतों की चीजों की ख्ररीदारी करते थे। यहां से सामानों की आपूर्ति पूरे पूर्वांचल भर में की जाती थी।
बनारस की यही एक ऐसी मंडी थी जहां पर ऐसा कौन सा सामान नहीं मिलता था। देशी ही नहीं विदेशी सामान भी बहुत ही आसानी से मिल जाते थे। इसी का फायदा उठा कर यहां के व्यवसायियों ने पटाखे का कारोबार किया जिसका नतीजा यह हुआ कि यह इलाका पटाखों के लिए भी काफी मशहूर हो गई। यह अलग बात है कि इन पटाखों की वजह से कई बार कई लोग घायल भी हुए। शिव बारात समिति के संयोजक दिलीप सिंह ने जिला प्रशासन को पत्र लिखा कि चौक थाना क्षेत्र के एक परिसर में काशी विश्वनाथ मंदिर है। जहां सुरक्षा के नाम पर पुलिस फोर्स की तैनाती रहती है।

यहां पर माचिस की तीली ले जाने पर भी प्रतिबंध है। वहीं दूसरी ओर दालमंडी जैसे अतिसंवेदनशील इलाके में भारी मात्रा में पटाखों का लाइसेंस देने का क्या औचित्व है। जबकि यहां की गलियां संकरी है। कोई भी अप्रिय घटना हो सकती है। यहां पर कुछ होने पर दमकल भी नहीं पहुंच सकता है। शिव बारात समिति ने हाईकोर्ट में एक जनहति याचिका दायर किया। तत्कालीन न्यायाधीश जस्टिस हेमंत लक्ष्मण गोखले ने पूरी बात सुनी और थाना चौक, कोतवाली, दशाश्वमेध जैसे सघन एरिया में पटाखें का लाइसेंस एवं बिक्री पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया। दीपावली के मद्देनजर खुले बाजार में अस्थायी लाइसेंस देने की बात थी। अब जब कि दालमंडी इलाके में पटाखे पर पूरी तरह रोक है। दालमंडी उजड़ चुकी है। ऐसे में सपनों की सड़क दालमंडी इलाके में विकास का कार्य चल रहा है। यह विकास दालमंडी को किस विकास के रास्ते पर ले जायेगा यह तो आने वाला समय ही बतायेगा।
