वाराणसी (रणभेरी): वाराणसी में प्रवास पर पहुंचे शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने सरकार और प्रशासनिक तंत्र पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि जानबूझकर ऐसे हालात बनाए जा रहे हैं, जिससे हिंदू समाज खासतौर पर गुरुकुलों में अध्ययनरत बालकों के मन में भय बैठे। शंकराचार्य के अनुसार, बच्चे यह आशंका जता रहे हैं कि यदि उनके मठ या गुरुकुल पर बुलडोजर कार्रवाई हुई तो उनकी पढ़ाई कहां और कैसे होगी। उन्होंने इसे “सुनियोजित भय का वातावरण” करार दिया।
आश्रम में मीडिया से बातचीत में शंकराचार्य ने कहा कि सरकार के विरुद्ध आवाज़ उठाने पर दमनात्मक कार्रवाई का डर दिखाया जा रहा है। उन्होंने ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए कहा कि मुगल काल में भी हिंदुओं ने अपने धार्मिक प्रतीकों की रक्षा के लिए बलिदान दिए, लेकिन चोटी नहीं कटवाई; आज पुलिस द्वारा चोटी पकड़कर कार्रवाई किए जाने की घटनाएं हिंदू समाज को मानसिक रूप से डराने का प्रयास हैं।
गुरुकुलों को निशाना बनाने का आरोप
शंकराचार्य ने कहा कि इन कार्रवाइयों का उद्देश्य हिंदू बालकों को गुरुकुलों से दूर रखना है, ताकि वे सनातन धर्म का अध्ययन न कर सकें और भविष्य में धर्म-प्रचारक न बनें। उन्होंने इसे हिंदू व्यवस्था को कमजोर करने की साजिश बताया।
मांस निर्यात और गौ-रक्षा पर सवाल
उन्होंने उत्तर प्रदेश से हो रहे मांस निर्यात पर भी सवाल उठाए। शंकराचार्य का दावा है कि भैंस के मांस की आड़ में गोमांस का व्यापार हो रहा है और जब्त कंटेनरों की जांच में गाय के मांस की पुष्टि के उदाहरण सामने आए हैं। उन्होंने गौ माता को क्षति पहुंचाने वालों को लोकतांत्रिक तरीके से वोट न देने की अपील की और स्पष्ट किया कि उनका आशय किसी प्रकार की हिंसा से नहीं है।

40 दिन का अल्टीमेटम
शंकराचार्य ने कहा कि उन्होंने 40 दिनों का समय दिया है। जो लोग भगवा वस्त्र धारण कर मांस व्यापार से जुड़े हैं, वे या तो यह व्यापार छोड़ें या पाखंड त्यागें। उन्होंने कहा कि सत्य को सामने रखना उनका दायित्व है और वे इससे पीछे नहीं हटेंगे।
संसद में भी उठा मुद्दा
इधर, आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह ने संसद सत्र के दौरान माघ मेले की घटना का जिक्र करते हुए कहा कि शंकराचार्य के शिष्यों और बटुकों के साथ हुई बदसलूकी निंदनीय है। उन्होंने प्रशासन की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि प्रमाण मांगने की प्रवृत्ति लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत है। संजय सिंह ने कटाक्ष करते हुए कहा कि जो लोग वर्षों में अपनी डिग्री नहीं दिखा पाए, वे शंकराचार्य से पहचान का प्रमाण मांग रहे हैं। समूचे घटनाक्रम ने धर्म, प्रशासन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर नई बहस छेड़ दी है, जिस पर राजनीतिक और सामाजिक हलकों में तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।
