काव्य रचना

भारत माँ
भारत माँ नाज करेगी अपने संतानों पर,
जब लहराएगा तिरंगा आसमानों पर,
तब फक्र करेगा हिंदुस्तान अपने दीवानो पर।
जब तक सीने में है रक्त की बूँदे,
तिरंगे की शान को कम न होने देंगे,
जब तक दिल में चल रही धड़कने,
भारत माँ का शीश न झुकने देंगे।
मैं उस देश का वासी हूँ,
जहां की अनेकता में एकता का गुणगान पूरी दुनिया गाती।
अनेक धर्म और अनेक जातियां,
लेकिन भारत माँ के सपूत हम
जब तक है जान तब तक करेंगे तिरंगे को सलाम।
जैसे सारे देश वासी भारत माँ के सपूत है ,
मैं भी उनके गोद में पला और बड़ा हुआ,
मैं हूँ तिरंगा इस भारत का जिसे नया रूप मैडम कामा ने दिया।
दिल में वंदे मातरम की थी ललकार,
और माथे पर सप्तर्षि का सार,
नीचे थे चाँद सूरज
जिसकी थी चमक छलकार ।
1931 में और चला मैं,
दिल में जब चर्खे का प्रतीक मिला,
मै वीर शहीदो को दर्शाता,
भारतीय सेना का मनोबल बढ़ाता।
आजादी का उत्सव मनाता पूरा भारत,
जब पहली बार लाल किले पर फहराया,
दिल में जो अशोक चक्र का स्वारूप है,
मै हूँ वो तिरंगा जो भारत देश का प्रतीक है।
कई धर्मो और जातियों को मैंने,
मातृभूमि की डोर से जोड़ा है,
भारतवासी मुझे सम्मान से फहराते है,
और एक राग में राष्ट्रगान गाते हैं।
श्यामलाल की पंक्ति हैं उचित,
विजयी विश्व तिरंगा प्यारा,
झंडा उच्चा रहे हमारा।।।
अनुराग कुमार सिंह