(रणभेरी): उर्दू शायरी की दुनिया के दिग्गज नाम बशीर बद्र का गुरुवार दोपहर 91 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उनके निधन की खबर सामने आते ही साहित्य, शायरी और सांस्कृतिक जगत में शोक की लहर फैल गई। अपनी नर्म लहजे की ग़ज़लों और इंसानी रिश्तों को बेहद सादगी से बयां करने वाले बशीर बद्र दशकों तक उर्दू अदब की पहचान बने रहे।
कानपुर से शुरू हुआ सफर
कानपुर में 15 फरवरी 1935 को जन्मे बशीर बद्र का असली नाम सैयद मोहम्मद बशीर था। उनका पैतृक घर शहर के कर्नलगंज क्षेत्र के बशीरगंज मोहल्ले में स्थित था। उनके पिता सैयद मोहम्मद नजीर पुलिस विभाग में कार्यरत थे। शुरुआती पढ़ाई उन्होंने कानपुर के हलीम मुस्लिम कॉलेज से की। बचपन में ही पिता का तबादला इटावा हो गया, जिसके बाद उनकी आगे की शिक्षा वहीं पूरी हुई। उन्होंने मोहम्मद सिद्दीक़ इस्लामिया कॉलेज से हाईस्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण की।
कम उम्र में संभाली परिवार की जिम्मेदारी
हाईस्कूल के बाद पिता के निधन ने उनके जीवन की दिशा बदल दी। परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण उन्हें अपनी पढ़ाई बीच में छोड़कर नौकरी करनी पड़ी। बताया जाता है कि उन्होंने मात्र 85 रुपये मासिक वेतन पर पुलिस विभाग में काम शुरू किया ताकि परिवार का पालन-पोषण हो सके।
इसी दौरान उनका विवाह कमर जहां से हुआ। इस रिश्ते से उनके तीन बच्चे हुए। आर्थिक संघर्षों के बीच भी उन्होंने अपने साहित्यिक जुनून को कभी खत्म नहीं होने दिया।
सातवीं कक्षा में छपी थी पहली ग़ज़ल
बशीर बद्र को बचपन से ही शायरी लिखने का शौक था। उनकी पहली ग़ज़ल सातवीं कक्षा के दौरान प्रसिद्ध पत्रिका ‘निगार’ में प्रकाशित हुई थी। इस रचना के बाद स्थानीय साहित्यिक मंचों पर उनकी चर्चा होने लगी। 20 वर्ष की आयु तक उनकी ग़ज़लें भारत और पाकिस्तान की प्रतिष्ठित उर्दू पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगी थीं। धीरे-धीरे उन्होंने उर्दू शायरी में अपनी अलग और खास पहचान बना ली।
नौकरी के साथ जारी रखी पढ़ाई
लंबे अंतराल के बाद उन्होंने दोबारा पढ़ाई शुरू की। उन्होंने जामिया की अदीब माहिर और अदीब कामिल परीक्षाएं उत्तीर्ण कीं। इसके बाद अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से बीए, एमए और पीएचडी की डिग्री हासिल की।
उनका शोध विषय “आजादी के बाद उर्दू ग़ज़ल का आलोचनात्मक अध्ययन” था। वर्ष 1967 में उन्होंने पुलिस विभाग की नौकरी छोड़ दी और पूरी तरह साहित्य तथा अध्यापन से जुड़ गए। उस समय विश्वविद्यालय से मिलने वाले वजीफे और मुशायरों की आमदनी से उन्होंने परिवार की जिम्मेदारियां निभाईं।
मुशायरों से मिली देशभर में पहचान
पीएचडी पूरी करने के बाद उन्होंने कुछ समय तक अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में अध्यापन किया। बाद में उनकी नियुक्ति मेरठ यूनिवर्सिटी में हुई। इसी दौरान देशभर के मुशायरों में उनकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ी। उनकी ग़ज़लों की खासियत थी कि वे कठिन भावनाओं को बेहद आसान शब्दों में पेश करते थे। मोहब्बत, तन्हाई, रिश्ते और जिंदगी की सच्चाइयों को उन्होंने जिस अंदाज में लिखा, वह आम लोगों के दिलों तक पहुंचा।
निजी जीवन में झेले कई दर्द
साल 1984 में वह एक मुशायरे के सिलसिले में पाकिस्तान गए हुए थे, तभी उनकी पत्नी का निधन हो गया। उस कठिन समय में उनके पड़ोसियों ने अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी निभाई। इसके कुछ वर्ष बाद 1987 के मेरठ दंगों में उनका घर आगजनी की भेंट चढ़ गया। इस घटना ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया। बाद में उन्होंने डॉ. राहत सुल्तान से विवाह किया और फिर भोपाल में स्थायी रूप से रहने लगे।
शायरी की दुनिया में हमेशा जिंदा रहेंगे
बशीर बद्र ने अपनी शायरी से कई पीढ़ियों को प्रभावित किया। उनकी ग़ज़लों के अनेक शेर आज भी लोगों की जुबान पर हैं। साहित्य जगत का मानना है कि उनकी रचनाएं आने वाले समय में भी उर्दू अदब की धरोहर बनी रहेंगी।
