वाराणसी (रणभेरी): धर्म और अध्यात्म की नगरी काशी में स्थित भगवान जगन्नाथ मंदिर में 15 दिनों के विराम के बाद मंगलवार को भक्तों के लिए कपाट खोल दिए गए। प्रातःकाल से ही बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर पहुंचे और भगवान जगन्नाथ, बलभद्र एवं माता सुभद्रा के दर्शन कर पुण्य लाभ प्राप्त किया। मंदिर परिसर में विशेष पूजा-अर्चना, भव्य आरती और प्रसाद वितरण का आयोजन किया गया।
स्नान पूर्णिमा के बाद 14 दिनों तक रहे अनवसर में
मंदिर की परंपरा के अनुसार ज्येष्ठ पूर्णिमा पर भगवान का विशेष जलाभिषेक किया जाता है। मान्यता है कि इस अवसर पर अत्यधिक जलाभिषेक के कारण भगवान अस्वस्थ हो जाते हैं। इसके बाद उन्हें 14 दिनों तक विश्राम कराया जाता है, जिसे अनवसर काल कहा जाता है। इस दौरान मंदिर के कपाट आम श्रद्धालुओं के लिए बंद रहते हैं और भगवान को प्रतिदिन औषधीय काढ़े का भोग अर्पित किया जाता है।
स्वास्थ्य लाभ के उपरांत आषाढ़ मास की अमावस्या तिथि पर प्रातः लगभग 5 बजे भगवान ने पुनः भक्तों को दर्शन दिए। दर्शन प्रारंभ होते ही मंदिर में श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लग गईं।
विशेष श्रृंगार और पंचामृत से हुआ अभिषेक
मंदिर के प्रधान पुजारी ने भगवान का सफेद वस्त्र और सफेद पुष्पों से विशेष श्रृंगार किया। इसके बाद पंचामृत से अभिषेक कर विधिवत पूजा संपन्न कराई गई। भव्य आरती के पश्चात श्रद्धालुओं में पंचामृत प्रसाद वितरित किया गया। परंपरा के अनुसार भगवान को परवल के रस का विशेष भोग भी अर्पित किया गया।
आज निकलेगी डोली, तीन दिनों तक चलेगा रथयात्रा महोत्सव
मंदिर प्रशासन के अनुसार बुधवार को भगवान की पारंपरिक डोली यात्रा निकाली जाएगी। इसके बाद 16 से 18 जुलाई तक आयोजित होने वाले रथयात्रा महोत्सव में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और माता सुभद्रा सुसज्जित रथ पर विराजमान होकर भक्तों को दर्शन देंगे। इस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के शामिल होने की संभावना है।
काशी में जगन्नाथ मंदिर की स्थापना का इतिहास पुरी से काशी तक की यात्रा
अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में पुरी स्थित जगन्नाथ मंदिर के तत्कालीन मुख्य पुजारी ब्रह्मचारीजी का पुरी के तत्कालीन शासक से मतभेद हो गया। इसके बाद उन्होंने पुरी छोड़ दिया और भगवान जगन्नाथ, बलभद्र तथा सुभद्रा की प्रतिमाओं के प्रतिरूप के साथ काशी आकर अस्सी घाट क्षेत्र में निवास करने लगे।

बाद में पुरी के शासक को अपनी भूल का एहसास हुआ और उन्होंने ब्रह्मचारीजी के लिए नियमित रूप से भगवान को अर्पित महाप्रसाद काशी भेजना शुरू किया। कहा जाता है कि प्रत्येक सप्ताह बहंगी के माध्यम से यह प्रसाद पहुंचाया जाता था, क्योंकि ब्रह्मचारीजी केवल भगवान को अर्पित भोग ही ग्रहण करते थे।
चक्रवात के कारण रुकी प्रसाद व्यवस्था
एक समय उड़ीसा में आए भीषण चक्रवात और बाढ़ के कारण कई सप्ताह तक महाप्रसाद काशी नहीं पहुंच सका। लंबे समय तक प्रतीक्षा करने के बाद ब्रह्मचारीजी अत्यंत चिंतित हुए। इसी दौरान उन्हें स्वप्न में भगवान जगन्नाथ ने काशी में मंदिर निर्माण कराने और वहीं नियमित भोग अर्पित करने का संकेत दिया।
भोंसले शासकों ने कराया मंदिर निर्माण
स्वप्न के बाद ब्रह्मचारीजी ने भोंसले शासन से सहायता का अनुरोध किया। छत्तीसगढ़ के शासक व्यंकोजी भोंसले ने मंदिर निर्माण के लिए आर्थिक सहयोग प्रदान किया। मंदिर के रखरखाव और रथयात्रा के आयोजन हेतु तखतपुर महाल की आय भगवान जगन्नाथ को समर्पित कर दी गई।
भोंसले शासन के मंत्री पंडित बेनीराम तथा कटक के दीवान विश्वंभर पंडित के सहयोग से मंदिर निर्माण कार्य आगे बढ़ा और वर्ष 1790 में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा का भव्य मंदिर पूर्ण होकर तैयार हुआ।
1857 के बाद बंद हो गई आय
1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद भोंसले शासन की संपत्तियां अंग्रेजों के नियंत्रण में चली गईं, जिससे मंदिर को मिलने वाला राजस्व भी समाप्त हो गया। आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद मंदिर की पूजा-पद्धति और धार्मिक परंपराएं निरंतर जारी रहीं।
इसके बाद मंदिर की व्यवस्था पंडित बेनीराम को सौंपी गई। उनके निधन के पश्चात उनके वंशज लगातार पीढ़ी-दर-पीढ़ी मंदिर की सेवा और पूजा-अर्चना का दायित्व निभाते आ रहे हैं।

ब्रह्मचारीजी की समाधि भी है आस्था का केंद्र
बताया जाता है कि वर्ष 1818 में पुरी की यात्रा पूर्ण करने के बाद ब्रह्मचारीजी पुनः काशी लौटे और अस्सी घाट क्षेत्र में समाधि ली। मंदिर परिसर में आज भी उनकी स्मृति से जुड़ी वस्तुओं का श्रद्धापूर्वक संरक्षण और पूजन किया जाता है।
मंदिर की विशेषताएं
मंदिर में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और माता सुभद्रा की मुख्य प्रतिमाओं के साथ भगवान नरसिंह, भक्त प्रह्लाद तथा गरुड़ देव की प्रतिमाएं भी स्थापित हैं। लगभग 16 मीटर ऊंचे मुख्य शिखर वाले इस मंदिर का स्थापत्य वैष्णव परंपरा की झलक प्रस्तुत करता है।
मंदिर परिसर तीन भागों में विभाजित है, जिन्हें तीन प्रवेश द्वार जोड़ते हैं। चारों कोनों में भगवान कृष्ण, राम पंचायतन, कालियामर्दन स्वरूप तथा लक्ष्मीनारायण की प्रतिमाएं स्थापित हैं। परिसर की लंबी और सीधी संरचना के कारण यह किसी भव्य गलियारे जैसा दृश्य प्रस्तुत करता है। मुख्य द्वार से गर्भगृह तक का सीधा दृश्य श्रद्धालुओं को सहज रूप से दिखाई देता है।
रथयात्रा को लेकर उत्साह
भगवान के दर्शन पुनः प्रारंभ होने के साथ ही श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह देखने को मिल रहा है। आगामी रथयात्रा महोत्सव को लेकर मंदिर प्रशासन ने सभी आवश्यक तैयारियां पूरी कर ली हैं। तीन दिनों तक चलने वाले इस धार्मिक आयोजन में देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं के शामिल होने की संभावना है।
