- बलात्कार के चर्चित प्रकरण में गैर जमानती वारंट और धारा 82 के बाद अब 83 सीआरपीसी
- गैर-जमानती वारंट, उद्घोषणा और अब कुर्की आदेश के बाद भी गिरफ्तारी नहीं
- बैंक खाते और संपत्ति अटैच करने का निर्देश, पुलिस की भूमिका फिर सवालों में
- अदालत सख्त, लेकिन ज़मीनी कार्रवाई शून्य- क्या आदेश कागज़ तक सीमित?
“वाराणसी पुलिस के ठेंगे पर कोर्ट का आदेश”
वाराणसी (रणभेरी): एनबीडब्ल्यू, धारा 82 और अब धारा 83 जब न्यायालय अपने सभी कठोर औजार इस्तेमाल कर चुका हो और फिर भी आरोपी खुलेआम घूमते रहें, तो यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि व्यवस्था की खुली विफलता है। शिवपुर प्रकरण में अदालत लगातार सख्त होती गई, लेकिन पुलिस की कार्रवाई वहीं की वहीं जमी रही। सवाल सीधा है क्या आदेश सिर्फ कागज़ के लिए हैं?
एफआईआर संख्या 71/2024 में 23 दिसंबर 2025 और 8 जनवरी 2026 की पुलिस रिपोर्टों में आरोपी ‘नहीं मिले’ बताए गए। 4 फरवरी 2026 को न्यायालय ने इन रिपोर्टों को नकारते हुए गैर जमानती वारंट के साथ धारा 82 दंड प्रक्रिया संहिता लागू की। इसके बाद भी आरोपी पेश नहीं हुए तो धारा 83 के तहत निशांत सिंह (उर्फ शिवम) और शीतांशु सिंह (उर्फ सत्यम) के यूनियन बैंक, सारनाथ स्थित खातों और संपत्तियों को अटैच करने का आदेश दिया गया, और 27 अप्रैल 2026 तक रिपोर्ट मांगी गई। अग्रिम जमानत पहले ही खारिज हो चुकी है गिरफ्तारी पर कोई रोक नहीं।
अब बचता क्या है? जब अदालत आरोपी को फरार मान चुकी है और संपत्ति तक कुर्क करने का आदेश दे चुकी है, तब भी गिरफ्तारी नहीं होती, तो यह साफ संकेत है कि समस्या संसाधनों की नहीं, इच्छाशक्ति की है। पुलिस की यह निष्क्रियता न्यायालय के आदेशों को चुनौती देती नजर आती है। यह मामला अब अपराधियों से ज्यादा उस तंत्र पर सवाल खड़ा करता है जो उन्हें पकड़ने के लिए बना है। 27 अप्रैल 2026 केवल अगली तारीख नहीं यह तय करेगी कि कानून चलेगा या लापरवाही।

वाराणसी के शिवपुर थाना क्षेत्र से जुड़े बलात्कार के चर्चित प्रकरण में अब स्थिति और अधिक गंभीर हो गई है। अंजलि (बदला हुआ नाम) बनाम निशांत सिंह व अन्य मामले में न्यायालय द्वारा पहले गैर-जमानती वारंट और उसके बाद धारा 82 दंड प्रक्रिया संहिता के तहत उद्घोषणा जारी किए जाने के बावजूद आरोपियों की गिरफ्तारी न होना, पहले ही पुलिस प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर रहा था। अब न्यायालय ने इस निष्क्रियता को और गंभीर मानते हुए धारा 83 सीआरपीसी के तहत आरोपियों की संपत्ति कुर्क करने का आदेश भी जारी कर दिया है।
एफआईआर संख्या 71/2024 की परिवाद संख्या 1328/2024 से जुड़े इस मामले में न्यायालय ने अपने नवीनतम आदेश में स्पष्ट किया कि धारा 82 सीआरपीसी के तहत उद्घोषणा के बावजूद आरोपी न्यायालय के समक्ष उपस्थित नहीं हुए। इसे न्यायालय ने यह संकेत मानते हुए कि आरोपी जानबूझकर कानून से बच रहे हैं, धारा 83 सीआरपीसी के तहत उनकी संपत्ति पर सीधी कार्रवाई का निर्देश दिया।
अदालत के आदेश में विशेष रूप से निशांत सिंह (उर्फ शिवम) और शीतांशु सिंह (उर्फ सत्यम) के बैंक खातों, जो यूनियन बैंक, सारनाथ में स्थित हैं, तथा उनके लॉकर/अन्य संपत्तियों को अटैच करने की प्रक्रिया प्रारंभ करने का उल्लेख किया गया है। साथ ही संबंधित पुलिस को निर्देशित किया गया है कि इस कार्रवाई की प्रगति रिपोर्ट 27 अप्रैल 2026 तक न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत की जाए।
गौरतलब है कि इससे पूर्व 23 दिसंबर 2025 और 8 जनवरी 2026 को थाना शिवपुर की ओर से न्यायालय में दाखिल रिपोर्टों में यह कहा गया था कि आरोपी नहीं मिले । न्यायालय ने इन रिपोर्टों को अपर्याप्त मानते हुए 4 फरवरी 2026 को न केवल गैर-जमानती वारंट को प्रभावी बनाए रखने का आदेश दिया, बल्कि धारा 82 सीआरपीसी के तहत उद्घोषणा भी जारी की थी। इसके बावजूद यदि आरोपी गिरफ्त से बाहर हैं, तो यह स्थिति केवल जांच की गति पर नहीं, बल्कि पूरे क्रियान्वयन तंत्र पर सवाल खड़े करती है।
मामले में यह तथ्य भी रिकॉर्ड पर है कि आरोपियों निशांत सिंह और शीतांशु सिंह की अग्रिम जमानत याचिकाएं जिला अदालत से पहले ही खारिज हो चुकी हैं, जिससे उनकी गिरफ्तारी पर कोई न्यायिक बाधा शेष नहीं है। इसके बावजूद पुलिस द्वारा कोई ठोस कार्रवाई न किया जाना यह संकेत देता है कि न्यायालय के आदेशों और उनके अनुपालन के बीच एक गंभीर अंतर मौजूद है।
पीड़ित पक्ष लगातार यह आरोप लगाता रहा है कि आरोपी खुलेआम घूम रहे हैं और उन्हें तथा उनके परिवार को धमकियां भी मिल रही हैं, लेकिन इसके बावजूद पुलिस की निष्क्रियता बनी हुई है। ऐसे में यह मामला अब केवल महिला सुरक्षा या एक आपराधिक घटना तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह सीधे-सीधे न्यायालय की सर्वोच्चता बनाम प्रशासनिक उदासीनता की कसौटी बनता जा रहा है। पूर्व में भी इन आरोपियों पर मेहरबान रही है वाराणसी पुलिस – जैसे ऍफ़आईआर 383/2024 का न्यायालय के आदेश के बावजूद जल्दी दर्ज ना करना और मुख्य अभियुक्त बाबा संजय कुमार सिंह को अजमानतीय अपराध में गिरफ्तार करके सारनाथ थाने से ही रिया किए जाने का मामला। (उक्त दोनों मामले पूर्व में रणभेरी के संस्करण में प्रकाशित किए जा चुके हैं।
कानूनी दृष्टि से देखा जाए तो गैर-जमानती वारंट, धारा 82 और अब धारा 83 सीआरपीसी जैसे प्रावधानों का क्रमिक प्रयोग यह दर्शाता है कि न्यायालय इस मामले में आरोपियों की गिरफ्तारी सुनिश्चित कराने के लिए उपलब्ध सभी कठोर उपायों का उपयोग कर रहा है। इसके बावजूद यदि परिणाम शून्य है, तो यह स्थिति न्यायालयी आदेशों के वास्तविक क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
अब अगली सुनवाई 27 अप्रैल 2026 को नियत है। यह तिथि केवल अगली पेशी नहीं, बल्कि यह तय करने वाली कसौटी बनती जा रही है कि क्या अदालत के सख्त आदेश ज़मीनी स्तर पर प्रभावी होंगे, या फिर प्रशासनिक निष्क्रियता इस पूरे प्रकरण को और गहरे टकराव की दिशा में ले जाएगी।
कानूनी परिप्रेक्ष्य (बॉक्स)
NBW, 82 और 83 सीआरपीसी का क्रमिक अर्थ
• गैर जमानती वारंट : गिरफ्तारी का अनिवार्य आदेश
• धारा 82 सीआरपीसी : आरोपी को फरार घोषित करने की प्रक्रिया
• धारा 83 सीआरपीसी : आरोपी की संपत्ति कुर्क करने का प्रावधान
इन तीनों का एक साथ लागू होना यह दर्शाता है कि न्यायालय अब मामले को अत्यंत गंभीर श्रेणी में मान चुका है।
