वाराणसी में मोहर्रम की रौनक: शिवपुर से निकला दुलदुल का जुलूस, ‘या हुसैन’ की सदाओं से गूंजा इलाका

वाराणसी में मोहर्रम की रौनक: शिवपुर से निकला दुलदुल का जुलूस, ‘या हुसैन’ की सदाओं से गूंजा इलाका

वाराणसी (रणभेरी): मोहर्रम का महीना शुरू होते ही शहर के शिया बहुल क्षेत्रों में अकीदत और गम का माहौल दिखाई देने लगा है। इसी क्रम में गुरुवार देर रात शिवपुर क्षेत्र से अंजुमन पंजतनी के तत्वावधान में पारंपरिक दुलदुल का जुलूस निकाला गया। जुलूस में बड़ी संख्या में अकीदतमंद शामिल हुए और पूरे रास्ते नौहाख्वानी तथा मातम का सिलसिला जारी रहा। धार्मिक नारों और “या हुसैन” की सदाओं से वातावरण गूंज उठा।

जानकारी के अनुसार यह जुलूस मरहूम एखलाक हुसैन के इमामबाड़े से शुरू हुआ और अपने निर्धारित पारंपरिक मार्गों से गुजरते हुए लगभग दो किलोमीटर की दूरी तय कर अलसुबह वापस इमामबाड़े पहुंचकर संपन्न हुआ। हालांकि दूरी कम होने के बावजूद धार्मिक कार्यक्रमों, मजलिसों और विभिन्न स्थानों पर रुकने के कारण जुलूस को पूरा होने में करीब सात घंटे का समय लगा।

वाराणसी में मोहर्रम की रौनक: शिवपुर से निकला दुलदुल का जुलूस, ‘या हुसैन’ की सदाओं से गूंजा इलाका

मजलिस में इमाम हुसैन की कुर्बानी और इंसानियत का संदेश

जुलूस शुरू होने से पहले आयोजित मजलिस को संबोधित करते हुए मौलाना फिरोज हैदर ने करबला की घटना और इमाम हुसैन के जीवन पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि करबला का संदेश केवल एक समुदाय तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इंसानियत, सब्र और सत्य के साथ खड़े रहने की सीख देता है।

उन्होंने अपने संबोधन में हुर के जीवन का उल्लेख करते हुए कहा कि करबला के मैदान में वही हुर थे, जिन्होंने इमाम हुसैन के काफिले को रोकने का काम किया था। लेकिन परिस्थितियों और सच्चाई को समझने के बाद उन्होंने हक का रास्ता चुना। उन्होंने कहा कि जब हुर के साथ आए लोग प्यास और कठिनाइयों से जूझ रहे थे, तब इमाम हुसैन ने उनके लिए पानी की व्यवस्था कराई और इंसानियत की मिसाल पेश की।

मौलाना ने कहा कि दस मोहर्रम के दिन हुर ने यजीदी सेना को छोड़कर इमाम हुसैन का साथ दिया और सच्चाई के लिए लड़ते हुए शहीद हो गए। उन्होंने कहा कि यह घटना बताती है कि इंसान यदि सही रास्ता चुन ले तो उसका मुकद्दर बदल सकता है।

वाराणसी में मोहर्रम की रौनक: शिवपुर से निकला दुलदुल का जुलूस, ‘या हुसैन’ की सदाओं से गूंजा इलाका

अंजुमनों ने पेश की नौहाख्वानी और मातम

मजलिस के बाद अलम और दुलदुल का जुलूस निकाला गया। जुलूस के प्रारंभ में स्थानीय अंजुमन पंजतनी ने नौहाख्वानी और मातम की शुरुआत की। इसके बाद शहर की कई अन्य अंजुमनों ने भी इसमें हिस्सा लिया। रास्ते भर अंजुमन हैदरी, अंजुमन जव्वादिया समेत विभिन्न संगठनों द्वारा नौहा और मातम पेश किया गया।

जुलूस के दौरान अलग-अलग स्थानों पर धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन भी किया गया, जहां विभिन्न जिलों से आए मौलानाओं ने अपने विचार रखे।

करबला ने इंसानियत का रास्ता दिखाया: मौलाना ताहिर

कार्यक्रम के दौरान गाजीपुर से आए मौलाना सैयद ताहिर ने भी अपने संबोधन में करबला की अहमियत पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि इमाम हुसैन की शहादत केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक संदेश है।

अलसुबह समाप्त हुआ जुलूस, सुरक्षा व्यवस्था रही चाक-चौबंद

जुलूस अपने पारंपरिक मार्गों से गुजरने के बाद अलसुबह वापस इमामबाड़े पहुंचकर समाप्त हुआ। इस दौरान बड़ी संख्या में जायरीन और अकीदतमंद मौजूद रहे। कार्यक्रम के आयोजकों ने शामिल होने वाले लोगों का आभार व्यक्त किया।वहीं सुरक्षा व्यवस्था को देखते हुए प्रशासन की ओर से पूरे मार्ग पर पुलिस बल की तैनाती की गई थी, ताकि कार्यक्रम शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न कराया जा सके।

आज निकलेगा नवाब की ड्योढ़ी का ऐतिहासिक दुलदुल जुलूस

शुक्रवार को तीन मोहर्रम के अवसर पर औसानगंज स्थित नवाब की ड्योढ़ी से करीब एक सदी पुराना दुलदुल का जुलूस निकाला जाएगा। यह जुलूस इस बार विशेष रूप से चर्चा में है क्योंकि दालमंडी क्षेत्र में हुए ध्वस्तीकरण के बाद यह पहला बड़ा जुलूस होगा जो उस मार्ग से गुजरेगा।निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार जुलूस काशीपुरा होते हुए नारियल बाजार पहुंचेगा और वहां से आगे बढ़ते हुए चौक क्षेत्र के पीछे से दालमंडी मार्ग में प्रवेश करेगा।

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