- शान से वीरानी तक…275 साल पुराना वैभव अब जर्जर दीवारों में कैद
- सिर्फ ईंट-पत्थरों का ढांचा नहीं, बल्कि काशी की ऐतिहासिक स्मृति का जीवित दस्तावेज है किला
- संरक्षण की ठोस पहल नहीं होने से जर्जर हो रही दीवारें
वाराणसी (रणभेरी): गंगा के पूरब किनारे पर शान से खड़ा रामनगर किला कभी काशी की राजसी परंपरा, संस्कृति और स्थापत्य वैभव का जीवंत प्रतीक हुआ करता था। 18वीं शताब्दी में महाराजा बलवंत सिंह द्वारा निर्मित यह दुर्ग चुनार के लाल बलुआ पत्थरों से तराशा गया था, जिसकी भव्यता दूर से ही दर्शकों को आकर्षित कर लेती थी। मगर आज वही किला उपेक्षा, जर्जरता और अव्यवस्था की मार झेल रहा है।
दीवारों से झड़ता पलस्तर, नमी से काली पड़ी प्राचीरें और जगह-जगह उगी काई इस ऐतिहासिक धरोहर की मौन पीड़ा बयान करती हैं। जिन नक्काशियों और मेहराबों पर कभी शाही सौंदर्य झलकता था, वे अब टूट-फूट और धूल की परतों में गुम हो चुकी हैं। वर्षों से समुचित मरम्मत न होने के कारण किले का मूल स्वरूप खतरे में है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि संरचनात्मक संरक्षण तुरंत नहीं हुआ तो कई हिस्से स्थायी क्षति झेल सकते हैं।
किले के भीतर स्थित ‘सरस्वती भवन संग्रहालय’ कभी इसकी सबसे बड़ी पहचान हुआ करता था। यहाँ शाही काल के दुर्लभ अस्त्र-शस्त्र, हाथीदांत की बेशकीमती कलाकृतियाँ, पुरानी पालकियाँ और राजसी जीवनशैली से जुड़े अनगिनत अवशेष सुरक्षित रखे गए थे। मगर अब यह संग्रहालय खुद संरक्षण की गुहार लगाता नजर आता है।

अंदर धूल जमी अलमारियाँ, अपर्याप्त रोशनी और बिना रखरखाव के पड़े ऐतिहासिक सामान पर्यटकों को निराश कर देते हैं। सबसे चिंताजनक स्थिति विश्व प्रसिद्ध खगोलीय घड़ी की है, जिसे कभी विज्ञान और आध्यात्मिक ज्ञान के अद्भुत मेल के रूप में देखा जाता था। उचित तकनीकी देखभाल के अभाव में यह विरासत अब लगभग निष्क्रिय अवस्था में पहुंच चुकी है।
पर्यटक शुल्क वसूले जाने के बावजूद सुविधाओं का अभाव साफ झलकता है। रामनगर किले की बदहाली का सबसे बड़ा कारण इसका जटिल प्रबंधन ढांचा माना जा रहा है। किला आज भी काशी नरेश के शाही परिवार की निजी संपत्ति है। इसी वजह से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) जैसी सरकारी एजेंसियाँ यहाँ सीधे संरक्षण कार्य नहीं कर पातीं। निजी स्वामित्व और सरकारी संरक्षण तंत्र के बीच समन्वय का अभाव इस धरोहर को अधर में लटकाए हुए है।
स्थानीय नागरिकों और इतिहास प्रेमियों का मानना है कि यदि संयुक्त प्रबंधन मॉडल तैयार किया जाए, जिसमें शाही परिवार, प्रशासन और संरक्षण विशेषज्ञ साथ मिलकर काम करें, तो किले की स्थिति सुधर सकती है। फिलहाल न तो व्यापक संरचनात्मक सर्वे हो रहा है और न ही दीर्घकालिक संरक्षण योजना दिखती है।
विडंबना यह भी है कि यही परिसर विश्वप्रसिद्ध रामनगर रामलीला का केंद्र है, जिसे देखने देश-विदेश से लोग आते हैं। इतना बड़ा सांस्कृतिक मंच होने के बावजूद बुनियादी ढांचा बदहाल है।
रामनगर किला सिर्फ ईंट-पत्थरों का ढांचा नहीं, बल्कि काशी की ऐतिहासिक स्मृति का जीवित दस्तावेज है। अगर समय रहते संरक्षण की ठोस पहल नहीं हुई, तो आने वाली पीढ़ियाँ इस शाही वैभव को केवल तस्वीरों और किताबों में ही देख पाएंगी। अब जरूरत बजट से ज्यादा इच्छाशक्ति और जवाबदेह प्रबंधन की है, ताकि गंगा किनारे खड़ी यह विरासत फिर से गर्व से सिर उठा सके।
