वाराणसी (रणभेरी) : हिंदी भाषा और देवनागरी लिपि के उत्थान के लिए ऐतिहासिक भूमिका निभाने वाली नागरी प्रचारिणी सभा के 134वें स्थापना दिवस के अवसर पर बुधवार को शहर में जागरूकता पदयात्रा निकाली गई। स्थापना दिवस की पूर्व संध्या पर आयोजित इस पदयात्रा का शुभारंभ विशेश्वरगंज स्थित नागरी प्रचारिणी सभा परिसर से हुआ। बड़ी संख्या में साहित्य प्रेमियों, शिक्षाविदों, विद्यार्थियों और हिंदी सेवियों ने इसमें भाग लिया।
पदयात्रा नागरी प्रचारिणी सभा परिसर से निकलकर मैदागिन, कबीरचौरा, पिपलानी और लहुराबीर चौराहे से होते हुए राजकीय क्वींस कॉलेज पहुंची। पूरे मार्ग में प्रतिभागियों ने हिंदी भाषा और देवनागरी लिपि के प्रचार-प्रसार का संदेश दिया। इस दौरान “हिंदी के लिए दो कदम, नागरी के लिए दो कदम” जैसे नारों के माध्यम से लोगों को अपनी भाषा और साहित्यिक विरासत से जुड़ने का आह्वान किया गया।

पदयात्रा में शामिल लोगों ने हिंदी साहित्य के उन महान रचनाकारों को भी याद किया, जिन्होंने हिंदी को नई दिशा और पहचान देने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। भारतेंदु हरिश्चंद्र, जयशंकर प्रसाद, मुंशी प्रेमचंद और आचार्य रामचंद्र शुक्ल जैसे साहित्यकारों के योगदान का स्मरण करते हुए हिंदी के गौरवशाली इतिहास पर प्रकाश डाला गया।
राजकीय क्वींस कॉलेज पहुंचने के बाद एक साहित्यिक गोष्ठी का आयोजन किया गया। गोष्ठी में वक्ताओं ने नागरी प्रचारिणी सभा की ऐतिहासिक यात्रा, हिंदी भाषा के विकास में संस्था की भूमिका और साहित्य के क्षेत्र में इसके योगदान पर विस्तार से चर्चा की। वक्ताओं ने कहा कि सभा ने हिंदी को प्रतिष्ठा दिलाने, देवनागरी लिपि को बढ़ावा देने और साहित्यिक धरोहरों के संरक्षण में महत्वपूर्ण कार्य किया है।

गोष्ठी में बताया गया कि नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना 16 जुलाई 1893 को वाराणसी में हुई थी। इसके स्थापना कार्य में श्याम सुंदर दास, राम नारायण मिश्र और शिवकुमार सिंह की प्रमुख भूमिका रही। उल्लेखनीय है कि इन तीनों संस्थापकों का संबंध राजकीय क्वींस कॉलेज से भी रहा, जहां उन्होंने शिक्षा प्राप्त की थी।
वक्ताओं ने कहा कि नागरी प्रचारिणी सभा केवल एक संस्था नहीं, बल्कि हिंदी आंदोलन का एक महत्वपूर्ण केंद्र रही है। समय-समय पर इसने हिंदी भाषा, देवनागरी लिपि और भारतीय साहित्य की समृद्ध परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए कई महत्वपूर्ण कार्य किए हैं।
कार्यक्रम में मौजूद लोगों ने संकल्प लिया कि हिंदी भाषा और भारतीय साहित्य की विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए निरंतर प्रयास किए जाएंगे। स्थापना दिवस के अवसर पर आयोजित इस पदयात्रा ने शहर में हिंदी के प्रति सम्मान और जागरूकता का संदेश दिया।
