गंगा के बढ़ते जलस्तर से तटवर्ती इलाकों में बढ़ी परेशानी, सरइयाँ के निजी स्कूल में 24 परिवारों ने ली शरण
वाराणसी (रणभेरी): गंगा के जलस्तर में लगातार हो रही बढ़ोतरी ने तटवर्ती इलाकों के लोगों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। जलस्तर करीब एक सेंटीमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से बढ़ने के कारण निचले इलाकों में रहने वाले परिवारों को सुरक्षित स्थानों की ओर जाने को मजबूर होना पड़ रहा है। शैलपुत्री सरइयाँ वार्ड में बाढ़ का पानी घरों में दाखिल होने के बाद कई परिवारों ने अपना घर छोड़कर राहत शिविर का रुख किया है।
सरइयाँ क्षेत्र के एक निजी स्कूल में प्रशासन की ओर से राहत शिविर बनाया गया है। यहां फिलहाल करीब 24 परिवारों के 88 लोग रह रहे हैं। शिविर में 18 पुरुष और 25 महिलाएं हैं। इनमें एक गर्भवती महिला भी शामिल है। सबसे अधिक संख्या बच्चों की है। शिविर में करीब 45 बच्चे मौजूद बताए जा रहे हैं। ऐसे में बच्चों के भोजन और विशेषकर नवजात एवं दुधमुंहे बच्चों की जरूरतों को लेकर राहत व्यवस्था पर सवाल उठने लगे हैं।
नाश्ते में केला, बड़ों के लिए हलवा
राहत शिविर में रहने वाले लोगों के लिए प्रशासन की ओर से भोजन की व्यवस्था की गई है। सुबह के समय बच्चों को केला और वयस्कों को सूजी का हलवा दिए जाने की व्यवस्था बताई गई है। दोपहर के भोजन में दाल-चावल और शाम को पूरी-सब्जी उपलब्ध कराने की बात कही गई है।
हालांकि, शिविर में रह रहे परिवारों की सबसे बड़ी चिंता छोटे बच्चों को लेकर है। चार से छह महीने के शिशु, आठ महीने के बच्चे और करीब एक साल की उम्र के मासूमों के लिए सामान्य राहत भोजन पर्याप्त नहीं माना जा सकता। अभिभावकों का कहना है कि जिन बच्चों की उम्र अभी इतनी कम है कि वे सामान्य भोजन नहीं कर सकते, उनके लिए दूध की नियमित व्यवस्था होना जरूरी है।
सुबह तक नहीं पहुंचा दूध
राहत शिविर में मौजूद परिजनों के मुताबिक, सुबह करीब 10 बजे तक छोटे बच्चों के लिए दूध उपलब्ध नहीं कराया जा सका था। ऐसे में बच्चों के माता-पिता को खुद बाजार जाकर दूध खरीदना पड़ा। बाढ़ की स्थिति में जब परिवार पहले ही अपना घर और रोजमर्रा का सामान छोड़कर शिविर में रहने को मजबूर हैं, तब बच्चों की जरूरतों के लिए भी बाहर से सामान जुटाना उनके लिए अतिरिक्त परेशानी बन रहा है।
परिजनों का कहना है कि बड़े बच्चों के लिए केला, हलवा या अन्य भोजन किसी हद तक विकल्प हो सकता है, लेकिन दुधमुंहे बच्चों के मामले में स्थिति अलग है। ऐसे बच्चों की भोजन संबंधी जरूरतें उम्र के अनुसार होती हैं और केवल सामान्य राहत भोजन से उनकी आवश्यकता पूरी नहीं हो सकती।
45 बच्चों की मौजूदगी, अलग व्यवस्था की जरूरत
शिविर में करीब 45 बच्चों की मौजूदगी को देखते हुए अभिभावकों का कहना है कि बच्चों के लिए अलग से भोजन व्यवस्था की आवश्यकता है। इनमें अलग-अलग उम्र के बच्चे शामिल हैं। कुछ बच्चे ऐसे हैं जो सामान्य भोजन कर सकते हैं, जबकि कई मासूम अभी दूध या बेहद नरम आहार पर निर्भर हैं।
परिजनों की मांग है कि राहत शिविरों में भोजन की व्यवस्था करते समय केवल परिवार के सदस्यों की संख्या ही नहीं, बल्कि उनकी उम्र और जरूरतों का भी ध्यान रखा जाए। खासकर नवजात, दुधमुंहे बच्चों, गर्भवती महिलाओं और अन्य संवेदनशील लोगों के लिए आवश्यक सामग्री की अलग से व्यवस्था होनी चाहिए।
बाढ़ ने छीना घर, अब बच्चों की चिंता
शैलपुत्री सरइयाँ वार्ड के प्रभावित परिवारों के सामने इस समय दोहरी चुनौती है। एक ओर घरों में पानी भरने के कारण उन्हें सुरक्षित ठिकाने की तलाश करनी पड़ी, वहीं दूसरी ओर राहत शिविर में रहने के दौरान बच्चों की जरूरतों को पूरा करना चिंता का विषय बना हुआ है।
शिविर में पहुंचे परिवारों को उम्मीद थी कि कम से कम बच्चों के लिए जरूरी खाद्य सामग्री आसानी से उपलब्ध होगी। लेकिन छोटे बच्चों के लिए दूध की व्यवस्था नहीं होने से अभिभावक परेशान नजर आए। उनका कहना है कि बाढ़ जैसी आपदा की स्थिति में राहत शिविरों में बच्चों की जरूरतों को प्राथमिकता के आधार पर पूरा किया जाना चाहिए।
व्यवस्था पर उठ रहे सवाल
राहत शिविर में भोजन उपलब्ध कराना निश्चित रूप से प्रभावित परिवारों के लिए जरूरी राहत है, लेकिन बच्चों की उम्र और उनकी विशेष जरूरतों के अनुसार इंतजाम नहीं होने से व्यवस्था पर सवाल खड़े हो रहे हैं। सवाल यह भी है कि यदि किसी शिविर में बड़ी संख्या में छोटे बच्चे मौजूद हों तो उनके लिए दूध, शिशु आहार और अन्य आवश्यक सामग्री की उपलब्धता सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी किस स्तर पर तय है।
बाढ़ प्रभावित परिवारों का कहना है कि वे अपना घर छोड़कर प्रशासन के भरोसे राहत शिविर में आए हैं। ऐसे में उन्हें कम से कम बच्चों के लिए जरूरी भोजन और दूध जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए बाजार का सहारा न लेना पड़े, इसकी व्यवस्था होनी चाहिए।
अभिभावकों की मांग, बच्चों के लिए हो उम्र के हिसाब से भोजन
शिविर में रह रहे परिवारों की मांग है कि राहत सामग्री और भोजन वितरण की योजना बनाते समय बच्चों की आयु का भी रिकॉर्ड रखा जाए। इससे यह पता चल सकेगा कि कितने बच्चे सामान्य भोजन कर सकते हैं और कितने बच्चों के लिए दूध या विशेष आहार की आवश्यकता है।
बाढ़ की स्थिति लंबी खिंचने की आशंका के बीच अभिभावक चाहते हैं कि राहत शिविर में बच्चों के लिए नियमित दूध की व्यवस्था की जाए, ताकि उन्हें हर दिन बाजार पर निर्भर न रहना पड़े। उनका कहना है कि आपदा के समय सबसे ज्यादा ध्यान उन बच्चों पर दिया जाना चाहिए, जो अपनी जरूरत खुद बता भी नहीं सकते।
