- पीएनजी-सीएनजी से कारोबारियों की लागत घटी, लेकिन बाजार में महंगाई अब भी बेलगाम
- वाराणसी में रोज तीन हजार एलपीजी सिलिंडरों की बचत, सालाना आंकड़ा 11 करोड़ रुपये के पार
- सीएनजी और पीएनजी से हर दिन 58 लाख रुपये की बचत, फिर भी आम आदमी की थाली महंगी
वाराणसी (रणभेरी )। वाराणसी में पीएनजी और सीएनजी के बढ़ते इस्तेमाल ने ईंधन खर्च में बड़ी राहत जरूर दी है, लेकिन इसका फायदा अब तक आम उपभोक्ताओं तक नहीं पहुंच पाया है। ऊर्जा संकट और अंतरराष्ट्रीय हालात के बीच प्राकृतिक गैस आधारित ईंधन कारोबारियों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के लिए सस्ता विकल्प बनकर उभरा है। इसके बावजूद बाजार में रोजमर्रा की वस्तुओं और सेवाओं के दाम कम होने का नाम नहीं ले रहे हैं।
गैल इंडिया लिमिटेड के आंकड़ों के अनुसार शहर में प्रतिदिन करीब तीन हजार एलपीजी सिलिंडरों की बचत हो रही है। मौजूदा कमर्शियल सिलिंडर दरों के हिसाब से यह बचत हर महीने लाखों रुपये और सालाना 11 करोड़ रुपये से अधिक बैठती है। वहीं जिले में रोजाना करीब डेढ़ लाख किलोग्राम सीएनजी की खपत दर्ज की जा रही है, जिससे पेट्रोल और डीजल के मुकाबले बड़े पैमाने पर खर्च में कमी आई है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इतनी ऊर्जा जरूरत पारंपरिक ईंधनों से पूरी की जाती तो प्रतिदिन करोड़ों रुपये अतिरिक्त खर्च होते। मौजूदा आंकड़ों के मुताबिक पीएनजी और सीएनजी के उपयोग से शहर में हर दिन लगभग 58 लाख रुपये तथा सालाना करीब 212 करोड़ रुपये की बचत हो रही है। एलपीजी बचत को जोड़ने पर यह आंकड़ा लगभग 223 करोड़ रुपये तक पहुंच जाता है।
व्यवसायी सुशील कुमार के अनुसार होटल, रेस्टोरेंट और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के ईंधन खर्च में करीब 40 प्रतिशत तक कमी आई है। इससे कारोबारियों की संचालन लागत घटी है और आर्थिक राहत भी मिली है। लेकिन आम लोगों का कहना है कि जब ईंधन खर्च घट रहा है तो बाजार में खाने-पीने की चीजों और सेवाओं के दाम भी कम होने चाहिए थे।
उपभोक्ताओं का आरोप है कि कारोबारी ऊर्जा खर्च में हो रही बचत का लाभ ग्राहकों तक नहीं पहुंचा रहे हैं।
शहरवासियों का कहना है कि गैस सस्ती होने के बावजूद होटल, ढाबों और खानपान सेवाओं की कीमतों में कोई खास कमी नहीं आई है।
आर्थिक मामलों के जानकार मानते हैं कि यदि सरकार और संबंधित एजेंसियां इस बचत को उपभोक्ताओं तक पहुंचाने के लिए प्रभावी नीति बनाएं तो महंगाई पर काफी हद तक नियंत्रण पाया जा सकता है। फिलहाल स्थिति यह है कि ऊर्जा क्षेत्र में करोड़ों की बचत होने के बावजूद आम आदमी की रसोई और जेब पर महंगाई का बोझ जस का तस बना हुआ है।
