(रणभेरी) : संसद के निचले सदन लोकसभा में 17 अप्रैल 2026 की शाम एक अहम राजनीतिक घटनाक्रम सामने आया, जब महिला आरक्षण को जल्द लागू करने से जुड़ा संवैधानिक संशोधन विधेयक आवश्यक दो-तिहाई बहुमत हासिल नहीं कर सका। इसके साथ ही सरकार को इस पैकेज से जुड़े अन्य दो विधेयक भी वापस लेने पड़े।
सरकार का उद्देश्य “नारी शक्ति वंदन अधिनियम” के तहत महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण की प्रक्रिया को तेज करना था, लेकिन वोटिंग के नतीजों ने इस कोशिश को बड़ा झटका दिया। कुल 528 सांसदों में से 298 ने समर्थन और 230 ने विरोध में मतदान किया, जबकि संवैधानिक संशोधन के लिए 352 वोटों की जरूरत थी। सरकार को आवश्यक संख्या से 54 वोट कम मिले।
गिरा हुआ बिल और बढ़ा राजनीतिक तनाव
नतीजे घोषित होते ही सदन का माहौल पूरी तरह बदल गया। विपक्ष ने इसे लोकतांत्रिक जीत बताते हुए सरकार की रणनीति पर सवाल उठाए, वहीं सत्तापक्ष ने विपक्ष पर “महिला सशक्तिकरण के विरोध” का आरोप लगाया। सरकार की ओर से यह भी स्पष्ट किया गया कि चूंकि तीनों प्रस्ताव महिला आरक्षण, परिसीमन और केंद्र शासित प्रदेशों से जुड़े संशोधन—आपस में जुड़े हुए थे, इसलिए इन्हें अलग-अलग आगे नहीं बढ़ाया जा सकता।
543 सीटों पर आरक्षण लागू न होने की वजह क्या है?
विवाद का सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब महिला आरक्षण कानून पहले ही पारित हो चुका है, तो इसे मौजूदा लोकसभा सीटों पर तुरंत क्यों लागू नहीं किया जा सकता। सरकारी पक्ष के अनुसार 2023 के कानून में स्पष्ट रूप से यह प्रावधान किया गया था कि आरक्षण लागू करने से पहले जनगणना और उसके बाद परिसीमन की प्रक्रिया पूरी करनी होगी। इसी कारण मौजूदा 543 सीटों पर सीधे आरक्षण लागू करना संभव नहीं माना जा रहा है।
सीटों के पुनर्गठन पर सरकार का तर्क
सरकार का कहना है कि लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाकर लगभग 800 या उससे अधिक करने का प्रस्ताव इसलिए रखा गया था ताकि महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करते समय पुरुषों के लिए उपलब्ध सामान्य सीटों में भारी कमी न हो। उदाहरण के तौर पर तमिलनाडु जैसी सीट संरचना में बदलाव का हवाला देते हुए कहा गया कि सीटें बढ़ाने से महिलाओं को अधिक प्रतिनिधित्व मिलेगा और संतुलन भी बना रहेगा।
विपक्ष की आपत्ति और राजनीतिक आरोप
विपक्षी दलों ने इस पूरी प्रक्रिया को जटिल और टालने वाली रणनीति बताया। उनका कहना है कि सरकार जानबूझकर जनगणना और परिसीमन की शर्तें जोड़कर महिला आरक्षण को आगे बढ़ने से रोक रही है। कुछ विपक्षी नेताओं ने यह भी आरोप लगाया कि प्रस्तावित परिसीमन से उत्तर भारत के राज्यों का प्रभाव बढ़ सकता है, जबकि दक्षिणी राज्यों की राजनीतिक हिस्सेदारी घट सकती है।
परिसीमन का मुद्दा और दक्षिण भारत की चिंता
परिसीमन को लेकर दक्षिण भारतीय राज्यों में पहले से ही असंतोष देखने को मिल रहा है। आशंका जताई जा रही है कि यदि जनसंख्या के आधार पर नए सिरे से सीटों का निर्धारण हुआ तो संसद में उनका प्रतिनिधित्व कम हो सकता है। इसी चिंता के चलते इस मुद्दे को राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील माना जा रहा है।
ओबीसी आरक्षण का सवाल भी चर्चा में
इस पूरे विवाद में एक और अहम पहलू ओबीसी प्रतिनिधित्व का है। मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था में लोकसभा या विधानसभा में ओबीसी वर्ग के लिए अलग से आरक्षण का प्रावधान नहीं है। विपक्ष की मांग है कि महिला आरक्षण के भीतर ओबीसी महिलाओं के लिए अलग कोटा सुनिश्चित किया जाए, लेकिन इसके लिए विस्तृत जातीय आंकड़ों की आवश्यकता बताई जा रही है, जो अभी पूरी तरह उपलब्ध नहीं हैं।
बिल गिरने के बाद सरकार के सामने कई विकल्प हैं—
- नया संशोधित प्रस्ताव लाना, जिसमें शर्तों में बदलाव किया जाए
- जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया पूरी होने तक इंतजार करना
- राजनीतिक स्तर पर सहमति बनाने की कोशिश करना
- या फिर भविष्य के चुनावों में इसे प्रमुख राजनीतिक मुद्दा बनाना
महिला आरक्षण से जुड़ा 2023 का कानून अभी भी वैध है, लेकिन यह लागू तभी होगा जब निर्धारित शर्तें पूरी होंगी।
