वाराणसी (रणभेरी): काशी के ऐतिहासिक दालमंडी क्षेत्र में चल रहे सड़क चौड़ीकरण अभियान के बीच एक ऐसा मकान भी प्रभावित हो रहा है, जो संगीत, संस्कृति और फिल्म जगत से जुड़ी कई यादों का साक्षी रहा है। प्रख्यात तबला वादक लच्छू महाराज से जुड़ा यह भवन अब आंशिक ध्वस्तीकरण की प्रक्रिया से गुजर रहा है। परिवार के सदस्यों का कहना है कि यह केवल एक मकान नहीं, बल्कि बनारस की सांस्कृतिक विरासत और कई पीढ़ियों की स्मृतियों का केंद्र रहा है।
परियोजना के तहत भवन का लगभग 21 फीट हिस्सा अधिग्रहित किया गया है। प्रशासनिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ध्वस्तीकरण का कार्य भी शुरू हो चुका है। परिवार का मानना है कि विकास कार्यों का महत्व अपनी जगह है, लेकिन इसके साथ एक लंबे सांस्कृतिक अध्याय का अंत भी हो रहा है।
यादों से जुड़ा रहा दालमंडी का यह घर
परिवार के वरिष्ठ सदस्य और अधिवक्ता जयनारायण सिंह बताते हैं कि उनके पिता स्वर्गीय वासुदेव नारायण सिंह ने आपातकाल समाप्त होने के बाद वर्ष 1978 में यह मकान खरीदा था। मूल रूप से परिवार का संबंध सुल्तानपुर से था, लेकिन बाद में वे दालमंडी आकर बस गए।
उनके अनुसार, बड़े भाई लच्छू महाराज ने इसी मकान की बैठक में वर्षों तक तबले का रियाज किया। सुबह से शुरू होने वाला अभ्यास देर शाम तक चलता था। संगीत के प्रति उनकी साधना ने इस स्थान को कलाकारों और संगीत प्रेमियों के लिए विशेष बना दिया था।
जयनारायण सिंह कहते हैं कि अब जब भवन का हिस्सा टूट रहा है, तो ऐसा महसूस हो रहा है जैसे घर की दीवारों के साथ उससे जुड़ी अनगिनत स्मृतियां भी धीरे-धीरे मिटती जा रही हैं।

संगीत साधना को कभी व्यवसाय नहीं बनाया
परिवार के लोगों का कहना है कि लच्छू महाराज ने संगीत को केवल कला और साधना के रूप में देखा। वे पारिश्रमिक को प्राथमिकता देने के बजाय कला के सम्मान को अधिक महत्व देते थे। कई प्रतिष्ठित आयोजनों में उन्होंने देर रात और भोर तक अपनी प्रस्तुतियों से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया।
बताया जाता है कि वे अनुशासन और समयपालन के लिए भी प्रसिद्ध थे। परिवार के अनुसार, एक अवसर पर सम्मान संबंधी औपचारिक मुलाकात के लिए आने वाले अधिकारी निर्धारित समय पर नहीं पहुंचे तो उन्होंने अपनी दिनचर्या नहीं बदली और पूजा-अर्चना में व्यस्त हो गए।
गोविंदा से जुड़ा है परिवार का विशेष रिश्ता
परिवार का दावा है कि बॉलीवुड अभिनेता गोविंदा का इस घर से भावनात्मक संबंध रहा है। जयनारायण सिंह बताते हैं कि गोविंदा की मां निर्मला देवी का परिवार से पुराना परिचय था, जिसके चलते दोनों परिवारों के बीच भाई-बहन जैसा रिश्ता बना और समय के साथ मामा-भांजे का संबंध स्थापित हो गया।
उनके अनुसार, संघर्ष के शुरुआती दिनों में गोविंदा फिल्मी दुनिया में अवसर की तलाश में उनके छोटे भाई उदयनारायण सिंह के संपर्क में आए थे। बाद में उन्हें फिल्म जगत में आगे बढ़ने का अवसर मिला और संबंध और भी मजबूत होते गए।
परिवार का कहना है कि अभिनेता जब भी वाराणसी आते थे, तो दालमंडी स्थित इस मकान पर अवश्य पहुंचते थे। यहां वे लच्छू महाराज के साथ समय बिताते और संगीत से जुड़े अनुभवों को साझा करते थे।
संघर्ष के दिनों की एक याद
परिवार के सदस्यों ने गोविंदा के शुरुआती संघर्ष का एक दिलचस्प प्रसंग भी साझा किया। उनके अनुसार, फिल्मी पहचान मिलने से पहले एक बार वे शहर में निकल रही बारात में शामिल होकर नृत्य करने लगे थे। उस समय उन्हें कोई नहीं पहचानता था। मजाकिया अंदाज में उन्होंने कहा था कि एक दिन यही लोग उन्हें पहचानेंगे। बाद के वर्षों में वे हिंदी सिनेमा के प्रमुख सितारों में शामिल हो गए।

दालमंडी का बदलता सांस्कृतिक चेहरा
जयनारायण सिंह के अनुसार, कई दशक पहले दालमंडी केवल बाजार नहीं बल्कि संगीत और नृत्य की परंपराओं का महत्वपूर्ण केंद्र हुआ करती थी। यहां रात भर महफिलें सजती थीं और कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन करते थे।
समय के साथ प्रशासनिक सख्ती और सामाजिक बदलावों के कारण यह परंपरा धीरे-धीरे समाप्त होती गई। पुराने कोठे बंद हो गए और क्षेत्र का स्वरूप पूरी तरह बदल गया। आज वही इलाका आधुनिक यातायात और शहरी विकास योजनाओं के केंद्र में है।
चौड़ीकरण जरूरी, लेकिन भावनात्मक नुकसान भी बड़ा
परिवार के सदस्य मानते हैं कि तीर्थयात्रियों और आम लोगों की सुविधा के लिए सड़क चौड़ीकरण जैसी परियोजनाएं आवश्यक हैं। इससे यातायात व्यवस्था बेहतर होगी और क्षेत्र की व्यावसायिक उपयोगिता भी बढ़ेगी।
हालांकि उनका कहना है कि विकास कार्यों की कीमत केवल भूमि या भवनों के रूप में नहीं चुकानी पड़ती, बल्कि कई बार उनसे जुड़ी पीढ़ियों की स्मृतियां भी प्रभावित होती हैं। ऐसे स्थानों से लोगों का रिश्ता केवल आर्थिक नहीं बल्कि भावनात्मक और सांस्कृतिक भी होता है।
स्थानीय लोगों से संवाद की जरूरत
लच्छू महाराज के भतीजे वैभव सिंह का कहना है कि इस मकान में उनका बचपन बीता है। उनके अनुसार, चौड़ीकरण की प्रक्रिया से प्रभावित होने वाले परिवारों की भावनाओं को भी समझा जाना चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि ऐसी योजनाओं पर अमल से पहले स्थानीय निवासियों और व्यापारियों के साथ विस्तृत संवाद होना चाहिए। इससे लोगों को योजना की जानकारी मिलती और वे अपनी बात भी प्रशासन तक पहुंचा सकते।
विरासत और विकास के बीच संतुलन की चुनौती
दालमंडी चौड़ीकरण परियोजना एक ओर शहर के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है, वहीं दूसरी ओर यह कई ऐतिहासिक इमारतों और उनसे जुड़ी स्मृतियों को भी प्रभावित कर रही है।
लच्छू महाराज से जुड़ा यह मकान भी अब उसी बदलाव का हिस्सा बन चुका है। परिवार के लोगों का कहना है कि भवन का स्वरूप भले बदल जाए, लेकिन उससे जुड़ी यादें, संगीत की परंपरा और बनारस की सांस्कृतिक पहचान लोगों के दिलों में हमेशा जीवित रहेगी।
