पीढ़ियों से संजोई जा रही मूर्ति निर्माण की परंपरा, गंगा की मिट्टी से आकार ले रहीं गणेश-लक्ष्मी की प्रतिमाएं

पीढ़ियों से संजोई जा रही मूर्ति निर्माण की परंपरा, गंगा की मिट्टी से आकार ले रहीं गणेश-लक्ष्मी की प्रतिमाएं

वाराणसी (रणभेरी): पादरी क्षेत्र में पीढ़ियों से चली आ रही पारंपरिक मूर्ति निर्माण की कला आज भी अपनी पहचान बनाए हुए है। यहां के कारीगर गंगा की मिट्टी से भगवान गणेश और मां लक्ष्मी की आकर्षक प्रतिमाएं तैयार कर अपनी पारिवारिक विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। दीपावली को लेकर इन दिनों मूर्तियों के निर्माण का काम तेजी से चल रहा है।

पुराने मूर्तिकार एवं कला विशेषज्ञ सुरेश कुमार प्रजापति ने बताया कि उनका परिवार कई पीढ़ियों से मूर्ति निर्माण के कार्य से जुड़ा हुआ है। परिवार के सदस्यों ने इस पारंपरिक कला को पीढ़ी-दर-पीढ़ी सहेजकर रखा है। उन्होंने बताया कि गणेश-लक्ष्मी की प्रतिमाएं गंगा की मिट्टी से तैयार की जाती हैं। इन्हें सुंदर और आकर्षक स्वरूप देने में कारीगरों को काफी मेहनत, लगन और धैर्य की जरूरत होती है।

पीढ़ियों से संजोई जा रही मूर्ति निर्माण की परंपरा, गंगा की मिट्टी से आकार ले रहीं गणेश-लक्ष्मी की प्रतिमाएं

सुरेश कुमार प्रजापति के अनुसार, एक गणेश-लक्ष्मी की प्रतिमा को पूरी तरह तैयार करने में कम से कम दो महीने का समय लग जाता है। मिट्टी को आकार देने से लेकर प्रतिमा को अंतिम रूप देने तक कई चरणों में काम किया जाता है। उन्होंने बताया कि हर वर्ष की तरह इस बार भी दीपावली के मद्देनजर प्रतिमाओं का निर्माण किया जा रहा है। इस वर्ष मूर्तियों की बिक्री में अच्छा उछाल देखने को मिल रहा है, जिससे कारीगरों में खासा उत्साह है। उन्होंने कहा कि बदलते समय के बावजूद पारंपरिक मूर्ति निर्माण की कला को जीवित रखना ही उनके परिवार का मुख्य उद्देश्य है।

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