वाराणसी (रणभेरी): करवाचौथ के अवसर पर काशी में ऐतिहासिक नक्कटैया मेले का आयोजन किया गया। मूसलाधार बारिश के बावजूद मेले में श्रद्धालुओं का उत्साह कम नहीं हुआ। शूर्पणखा की नाक काटने की लीला देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग जुटे। रात करीब 10:30 बजे जैसे ही लक्ष्मण ने शूर्पणखा की नाक काटी, पूरा इलाका जय श्रीराम के जयकारों से गूंज उठा।
काशी की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं में विशेष स्थान रखने वाली नक्कटैया की लीला इस बार भी पूरे उत्साह के साथ संपन्न हुई। मेले के दौरान लगातार तेज बारिश होती रही, लेकिन श्रद्धालु अपनी जगह पर डटे रहे। लीला के प्रमुख दृश्य के दौरान दर्शकों में खासा उत्साह देखने को मिला। बारिश और अव्यवस्थाओं के बावजूद लोगों की भीड़ कम नहीं हुई।
रामलीला समिति के अध्यक्ष अजय गुप्ता ने बताया कि मेले की सभी तैयारियां पूरी कर ली गई थीं, लेकिन खराब मौसम के कारण आयोजन में कुछ बाधाएं आईं। उन्होंने कहा कि लखा मेला क्षेत्र की ऐतिहासिक परंपरा का हिस्सा है और लगातार 140 वर्षों से इसका आयोजन किया जा रहा है। इस बार भी समिति की ओर से जरूरी व्यवस्थाएं की गई थीं।

उन्होंने बताया कि मेले में सैकड़ों झांकियां शामिल होती हैं। इस बार भी बड़ी संख्या में झांकियां और कलाकार दूसरे स्थानों से पहुंचे हैं। ऐसे में बारिश के कारण उन्हें वापस भेजना उचित नहीं था। ऐसा करने से भविष्य में कलाकारों को दोबारा बुलाने में परेशानी हो सकती है। इसलिए समिति ने हर परिस्थिति में परंपरा को जारी रखने का प्रयास किया।
वहीं, राजीव यादव ने बताया कि यह नक्कटैया मेले का 140वां वर्ष है। तेज बारिश के बाद भी लीला का आयोजन सफलतापूर्वक संपन्न कराया गया। उन्होंने दावा किया कि बारिश के बावजूद करीब 11 लाख लोग मेला देखने पहुंचे।
अंग्रेजी शासन के विरोध का भी रहा है प्रतीक
नक्कटैया मेले का धार्मिक महत्व होने के साथ ही इसका ऐतिहासिक और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ा पक्ष भी रहा है। स्थानीय लोगों के मुताबिक, अंग्रेजी हुकूमत के दौर में इस लीला का इस्तेमाल ब्रिटिश शासन के विरोध के प्रतीक के रूप में किया जाता था।

धार्मिक आयोजन की आड़ में लोग अंग्रेजों के खिलाफ अपनी भावनाएं व्यक्त करते थे। बताया जाता है कि अंग्रेजी शासन भी इस परंपरा को बंद नहीं करा सका। तभी से नक्कटैया की लीला लगातार आयोजित होती आ रही है। बारिश के बीच शूर्पणखा की नाक काटने के प्रसंग और जय श्रीराम के जयकारों के साथ काशी की यह 140 साल पुरानी परंपरा एक बार फिर जीवंत हो उठी।
