विद्यार्थियों की समस्याओं को उठाने के लिए लोकतांत्रिक मंच जरूरी, लिंगदोह समिति की सिफारिशों के अनुरूप चुनाव कराने पर जोर
वाराणसी (रणभेरी): काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) में छात्रसंघ चुनाव बहाल कराने की मांग एक बार फिर तेज हो गई है। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) की बीएचयू इकाई ने विश्वविद्यालय प्रशासन से छात्रसंघ चुनाव को लेकर जल्द सकारात्मक निर्णय लेने और चुनाव की संभावित समयसीमा सार्वजनिक करने की मांग की है। परिषद का कहना है कि विद्यार्थियों की समस्याओं को प्रभावी ढंग से प्रशासन तक पहुंचाने और परिसर में लोकतांत्रिक भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए छात्रसंघ की बहाली जरूरी है।
विद्यार्थियों की आवाज बनेगा छात्रसंघ
ABVP इकाई अध्यक्ष पल्लव सुमन ने कहा कि छात्रसंघ विद्यार्थियों की आवाज को विश्वविद्यालय प्रशासन तक पहुंचाने का एक महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक मंच है। इसके माध्यम से छात्र शैक्षणिक समस्याओं, छात्रावास से जुड़ी परेशानियों और परिसर की अन्य समस्याओं को प्रभावी ढंग से उठा सकते हैं।
उन्होंने कहा कि छात्रसंघ विद्यार्थियों में नेतृत्व क्षमता, जिम्मेदारी और संवाद की भावना विकसित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। परिषद ने प्रशासन से इस दिशा में शीघ्र निर्णय लेने की अपील की है, ताकि विद्यार्थियों को अपना प्रतिनिधि चुनने का अवसर मिल सके।
1997 से नियमित छात्रसंघ चुनाव बंद
बीएचयू में छात्रसंघ चुनाव का इतिहास लंबे समय से विवाद और बदलावों से जुड़ा रहा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, विश्वविद्यालय में अंतिम पूर्ण छात्रसंघ चुनाव 1996 में हुआ था। फरवरी 1997 में परिसर में हुई हिंसा के बाद छात्रसंघ भंग कर दिया गया। इसके बाद वर्ष 2011-12 में छात्र परिषद का गठन किया गया, लेकिन करीब एक साल बाद इसे भी बंद कर दिया गया।
वर्ष 2014 में भी छात्र परिषद के गठन की पहल हुई थी। हालांकि, छात्र संगठनों का कहना है कि इस व्यवस्था में सीधे चुनाव के माध्यम से चुने गए प्रतिनिधियों की व्यवस्था नहीं थी। ऐसे में छात्रसंघ चुनाव की बहाली की मांग लगातार उठती रही है।
लिंगदोह समिति की सिफारिशों के अनुरूप चुनाव की मांग
छात्र संगठनों की प्रमुख मांग है कि बीएचयू में लिंगदोह समिति की सिफारिशों के अनुरूप छात्रसंघ चुनाव कराए जाएं। इसके साथ ही चुनाव की स्पष्ट समयसीमा घोषित करने पर भी जोर दिया जा रहा है। संगठनों का मानना है कि निर्वाचित छात्र प्रतिनिधि विद्यार्थियों की समस्याओं को संगठित तरीके से प्रशासन के सामने रख सकेंगे और विश्वविद्यालय की निर्णय प्रक्रिया में उनकी भागीदारी बढ़ेगी।
