वाराणसी (रणभेरी): शारदीय नवरात्र के सातवें दिन काशी में मां कालरात्रि की आराधना के लिए भक्तों में खास उत्साह देखने को मिला। दशाश्वमेध क्षेत्र की कालका गली स्थित प्राचीन मंदिर में सुबह से ही श्रद्धालुओं का आगमन शुरू हो गया। भक्तों ने विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर परिवार की सुख-समृद्धि और जीवन में सुख-शांति की प्रार्थना की।
मंदिर में दर्शन के लिए पहुंचे श्रद्धालु मां को लाल चुनरी, गुड़हल के फूल, नारियल, फल, मिठाई, सिंदूर और रोली अर्पित करते नजर आए। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां कालरात्रि की उपासना से भय और विपत्तियों से रक्षा होती है। नवरात्र के सातवें दिन देवी के इस स्वरूप की पूजा को विशेष फलदायी माना जाता है।
काशी की प्राचीन धार्मिक परंपरा से जुड़ा मंदिर
मंदिर के प्रधान महंत पं. सुरेंद्र तिवारी के अनुसार, मां कालरात्रि काशी की प्रमुख आराध्य देवियों में शामिल हैं। धार्मिक ग्रंथों में भी उनके महत्व का उल्लेख मिलता है। मान्यता है कि भगवान शिव से अप्रसन्न होने के बाद माता पार्वती ने इस स्थान पर लंबे समय तक तपस्या की थी। श्रद्धालु मां के उग्र रूप के साथ उनके करुणामयी स्वरूप के प्रति भी गहरी आस्था रखते हैं।
मंदिर परिसर में मां के दर्शन के साथ गौरी केदारेश्वर, नील सरस्वती, भगवान गणेश और विष्णु सहित अन्य देवी-देवताओं के विग्रह भी मौजूद हैं। इससे मंदिर का धार्मिक महत्व और बढ़ जाता है। दर्शन के लिए पहुंचे श्रद्धालुओं ने पूजा-अर्चना के बाद सुख, शांति और समृद्धि की कामना की।

संकरी गलियों में सुरक्षा के विशेष इंतजाम
मंदिर तक पहुंचने वाले रास्ते संकरे होने के कारण श्रद्धालुओं की आवाजाही व्यवस्थित रखने के लिए पुलिस और मंदिर प्रशासन ने व्यवस्था संभाली। दशाश्वमेध थाने की पुलिस और श्री काशी विश्वनाथ मंदिर प्रशासन की टीम तड़के तीन बजे से ही ड्यूटी पर मुस्तैद रही। मंदिर की ओर जाने वाली गलियों और आसपास के क्षेत्र में निगरानी रखी गई, ताकि दर्शन के दौरान भीड़ को नियंत्रित किया जा सके। श्रद्धालु फूल-माला और पूजन सामग्री लेकर कतारों में अपनी बारी का इंतजार करते रहे। प्रशासन का जोर दर्शन व्यवस्था को सुचारु बनाए रखने और मंदिर परिसर में भीड़ के दबाव को कम करने पर रहा।
ऐसा है मां कालरात्रि का स्वरूप
नवरात्र के सातवें दिन पूजी जाने वाली मां कालरात्रि को देवी दुर्गा का सातवां स्वरूप माना जाता है। धार्मिक वर्णन के मुताबिक, उनका रंग गहरे अंधकार के समान है। उनके बाल खुले रहते हैं और तीन नेत्र हैं। उनके गले में चमकदार माला सुशोभित होती है, जबकि गर्दभ को उनका वाहन बताया गया है। देवी के हाथों में अस्त्र-शस्त्र रहते हैं। मां का स्वरूप भले ही उग्र माना जाता हो, लेकिन भक्तों को शुभ फल देने वाली देवी के रूप में उनकी विशेष पहचान है। इसी कारण उन्हें ‘शुभंकरी’ नाम से भी पुकारा जाता है।
शनि से जुड़ी मान्यता, गुड़ का लगाया जाता है भोग
धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताओं में मां कालरात्रि की पूजा का संबंध शनि ग्रह से भी जोड़ा जाता है। भक्त देवी से जीवन की परेशानियों, भय और बाधाओं को दूर करने की प्रार्थना करते हैं। पूजा के दौरान लाल फूल चढ़ाने और गुड़ का भोग लगाने की परंपरा भी प्रचलित है। नवरात्र के इस विशेष दिन मंदिर में दर्शन-पूजन के लिए पहुंचे श्रद्धालुओं ने मां से परिवार की खुशहाली और जीवन में सकारात्मकता बनाए रखने का आशीर्वाद मांगा।
