स्मार्ट मीटर योजना पर भी घमासान, उपभोक्ता परिषद ने बताया जनता पर हजारों करोड़ का अतिरिक्त बोझ
वाराणसी (रणभेरी): प्रदेश में बिजली दरों के निर्धारण से पहले बुधवार को राज्य विद्युत नियामक आयोग की राज्य सलाहकार समिति की अहम बैठक आयोजित हुई। बैठक में सबसे ज्यादा चर्चा स्मार्ट मीटर परियोजना और बिजली कंपनियों द्वारा प्रस्तावित नई टैरिफ दरों को लेकर रही। उपभोक्ता संगठनों ने बिजली कंपनियों की ओर से प्रस्तुत प्रस्तावों का तीखा विरोध करते हुए कहा कि कंपनियों पर पहले से ही उपभोक्ताओं का हजारों करोड़ रुपए का सरप्लस जमा है, ऐसे में बिजली दरों में वृद्धि के बजाय कटौती की जानी चाहिए।
बैठक में बिजली कंपनियों द्वारा वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए करीब 16,448 करोड़ रुपए का राजस्व घाटा दर्शाते हुए बिजली दरें बढ़ाने की मांग रखी गई। कंपनियों ने घरेलू उपभोक्ताओं पर भी टाइम ऑफ डे (TOD) टैरिफ लागू करने का प्रस्ताव दिया। इस व्यवस्था के तहत दिन के अलग-अलग समय के अनुसार बिजली की दरें तय की जाती हैं। पीक आवर्स में अधिक दरें वसूली जाती हैं, जबकि कम खपत वाले समय में उपभोक्ताओं को सस्ती बिजली उपलब्ध कराई जाती है।

उपभोक्ता परिषद ने इस प्रस्ताव पर सवाल उठाते हुए कहा कि प्रदेश की बिजली कंपनियों के पास पहले से ही लगभग 51 हजार करोड़ रुपए का सरप्लस मौजूद है। परिषद का कहना था कि जब कंपनियों की आर्थिक स्थिति इतनी मजबूत है तो उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त बोझ डालने का कोई औचित्य नहीं बनता। परिषद ने मांग की कि बिजली दरों में कम से कम 10 प्रतिशत की कटौती की जाए।
बैठक में स्मार्ट प्रीपेड मीटर योजना भी विवाद का प्रमुख विषय रही। उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश वर्मा ने आरोप लगाया कि इस परियोजना का आर्थिक बोझ सीधे आम उपभोक्ताओं पर डालने की तैयारी की जा रही है। उन्होंने कहा कि योजना की लागत पहले 18,885 करोड़ रुपए निर्धारित की गई थी, जो अब बढ़कर लगभग 27,342 करोड़ रुपए तक पहुंच गई है। यानी करीब 9 हजार करोड़ रुपए अतिरिक्त खर्च का भार जनता पर डाला जा रहा है। परिषद ने इसे उपभोक्ता हितों के खिलाफ बताते हुए योजना को तत्काल निरस्त करने की मांग की।
बैठक के दौरान नोएडा पावर कंपनी के कार्यों पर भी सवाल उठाए गए। परिषद की ओर से आरोप लगाया गया कि कंपनी गलत आंकड़े प्रस्तुत कर लाभ कमाने का प्रयास कर रही है। साथ ही कंपनी के वित्तीय मामलों और कार्यप्रणाली की नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) से जांच कराने की मांग भी रखी गई। परिषद ने कहा कि उपभोक्ताओं को दी जा रही 10 प्रतिशत रिबेट को आगामी वर्षों तक जारी रखा जाना चाहिए।
इसके अलावा प्रदेश में लागू बिजली रोस्टर व्यवस्था को समाप्त करने और सभी उपभोक्ताओं को 24 घंटे निर्बाध बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करने की मांग भी उठाई गई। परिषद ने कहा कि छोटे दुकानदारों और गरीब परिवारों को घरेलू कनेक्शन पर ही छोटे रोजगार चलाने की अनुमति दी जानी चाहिए, ताकि उन्हें अतिरिक्त व्यावसायिक बिजली दरों का बोझ न उठाना पड़े। अनुमानित तौर पर प्रदेश में करीब 35 लाख परिवार इस समस्या से प्रभावित हैं।
बैठक में बिजली विभाग में कर्मचारियों की भारी कमी का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया गया। परिषद ने कहा कि विभाग में खाली पदों के कारण उपभोक्ताओं को समय पर सेवाएं नहीं मिल पा रही हैं। इसलिए जल्द से जल्द भर्ती प्रक्रिया शुरू की जानी चाहिए।
उपभोक्ता संगठनों ने आरोप लगाया कि भारी सरप्लस के बावजूद बिजली दरें बढ़ाने की तैयारी आम जनता के साथ अन्याय है। उनका कहना था कि यदि वास्तविक सरप्लस का समुचित समायोजन किया जाए तो बिजली दरों में एकमुश्त 45 प्रतिशत तक कमी संभव है। वैकल्पिक रूप से अगले पांच वर्षों तक हर साल 8 से 10 प्रतिशत तक बिजली दरें घटाई जा सकती हैं।
राज्य विद्युत नियामक आयोग अब सभी पक्षों की दलीलें और सुझावों पर विचार करने के बाद नई टैरिफ दरों पर अंतिम निर्णय लेगा। फिलहाल उपभोक्ताओं की नजर आयोग के आगामी फैसले पर टिकी हुई है, क्योंकि इसका सीधा असर लाखों घरेलू और व्यावसायिक उपभोक्ताओं के बिजली बिल पर पड़ने वाला है।
