- धन्वन्तरि निवास पर 325 सालों से चल रही है पूजा की परम्परा
- धनत्रयोदशी के दिन साल में सिर्फ एक दिन होता है सभी को प्रभु का दर्शन
- काशी की आयुर्वेंदिक विरासत का है विशिष्ट धार्मिक केन्द्र
राधेश्याम कमल
वाराणसी (रणभेरी)। अष्टधातु की विश्व की सबसे दुर्लभ एवं अनूठी धन्वन्तरि भगवान की प्रतिमा काशी के सुड़िया स्थित वैद्यराज पं. शिवकुमार वैद्य के धन्वन्तरि निवास पर विराजमान है। यहां पर विगत 325 सालों से धन्वन्तरी भगवान की पूजा होती चली आ रही है। यह परम्परा अभी भी चली आ रही है। धनतेरस के दिन सिर्फ एक ही दिन श्रद्धालुओं को धन्वन्तरि भगवान का दर्शन हो पाता है।
धन्वन्तरि भगवान की शायद यह एकमात्र प्रतिमा है जिसका हर कोई दर्शन करता है। काशी को आयुर्वेद, चिकित्सा और आध्यात्मिक साधना की प्राचीन भूमि माना जाता है। ऐसे में सुड़िया स्थित धन्वन्तरि निवास का विशेष महत्व है। यहां स्थापित अष्टधातु की भगवान धन्वन्तरि प्रतिमा को भारत ही नहीं बल्कि विश्व की एकमात्र प्रतिमा बतायी जा रही है। धन्वन्तरि निवास के वैद्य पं. समीर कुमार शास्त्री बताते हैं कि धन्वन्तरि भगवान का दर्शन साल में सिर्फ धनतेरस के दिन सिर्फ पांच घंटे के लिए ही होता है। इस बार भी 6 नवम्बर के दिन सायंकाल 4 बजे से रात्रि 11 बजे तक आरोग्य रस की फुहार बहेगी। अपराह्न में मंदिर का कपाट खोला जाएगा।
धन्वन्तरि की आराधना केवल धार्मिक परम्परा नहीं
काशी में धन्वन्तरि भगवान की आराधना केवल एक धार्मिक परम्परा नहीं, बल्कि भारत की प्राचीन चिकित्सा विरासत का जीवंत प्रतीक है। समुद्र मंथन से अमृत कलश लेकर प्रगट हुए धन्वन्तरि भगवान को आयुर्वेद का आदिदेव माना गया है। उनके हाथों में सुशोभित अमृत कलश जीवनर रक्षा, चक्र रोगों के विनाश, शंंख सकारात्मक ऊर्जा और जोंक प्राचीन चिकित्सा पद्धति का संदेश देती है। धनतेरस पर धन्वन्तरि भगवान का दर्शन व पूजा हमें इस बात को याद दिलाती है कि धन से बड़ी सम्पत्ति स्वास्थ्य है। आभूषणों से बड़ा आभूषण निरोगी शरीर है और जीवन की सबसे बड़ी समृद्धि स्वस्थ्य जीवन है।
धन्वन्तरि भगवान को लगेगा औषधियों का भोग
धन्वन्तरि भगवान को विशिष्ट चमत्कारी औषधियों जैसे रस, स्वर्ण,हीरा, माणिक, पन्ना, मोती तथा जड़ी बूटियों में केशर, कस्तूरी, अंबर, अश्वगंधा, अमृता, शंखपुष्पी, मूसली आदि है। विशेष फूलों में आर्किड, लिली, गुलाब, ग्लेडियोलस, रजनीगंधा, तुलसी, गेंदा से शृंगार कर शास्त्रोक्त विधि से पूजन पं. शिव कुमार शास्त्री के पुत्र पं. रामकुमार शास्त्री, समीर कुमार शास्त्री, उत्पल शास्त्री, आदित्य, मिहिर, कोमल शास्त्री करते हैं। मंदिर परिसर में शहनाई की मंगल धुन एवं सुगंधित फूलों तथा औषधियों से पूरा माहौल भीनी भीनी खुशबू से भर जाता है। हर किसी को आरोग्य सुख की अपार अनुभूति होने लगती है। हर कोई वर्ष पर्यन्त आरोग्य सुख की अपार कामना लेकर यहां पहुंचने लगते हैं। रात्रि 11 बजे तक यहां हजारों महिलाओं एवं पुरुषों के आने का क्रम जारी रहता है। यहां दर्शन कर हर कोई अपने को निरोग महसूस करता है। श्रद्धालु कतारबद्ध होकर धन्वन्तरि भगवान का दर्शन कर खुद को भावविभोर करते हैं। ऐसा लगता है मानों साक्षात हरि सामने खड़े हो और दर्शन पाकर हर दर्शनार्थी अपने आप को तन मन से निरोग महसूस कर रहा हो।
