चाक की थाप पर संवर रही दिवाली की परंपरा

चाक की थाप पर संवर रही दिवाली की परंपरा
  • कुम्हार बस्ती में दिन-रात दीये और पारंपरिक बर्तन बनाने में जुटीं महिलाएं
  • चार-पांच महीने पहले से शुरू हो जाती है तैयारी, मिट्टी से तैयार कर रहीं दीये, गगरी, हड़िया और ढकनी
  • आधुनिकता की दौड़ में सिमट रहा पुश्तैनी कारोबार, युवा पीढ़ी का पारंपरिक पेशे से हो रहा मोहभंग

वाराणसी (रणभेरी): दीपावली की रात जब घर-आंगन में मिट्टी के दीये जगमगाएंगे और उनकी रोशनी से काशी का कोना-कोना दमकेगा, तब उस उजाले के पीछे कुम्हार परिवारों की महीनों की मेहनत छिपी होगी। फुलवरिया की कुम्हार बस्ती में इन दिनों चाक की लगातार घूमती धुरी और मिट्टी को आकार देते हाथ दीपावली की तैयारियों की कहानी बयां कर रहे हैं। यहां महिलाएं दिन-रात मेहनत कर मिट्टी के दीये और पारंपरिक बर्तन तैयार करने में जुटी हैं। त्योहार की खुशियों को रोशन करने के लिए इन परिवारों का पूरा समय अब मिट्टी के साथ गुजर रहा है।

कुम्हार बस्ती की रेणु देवी अपने परिवार के साथ पीढ़ियों से चली आ रही कुम्हारी की परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं। उनके हाथों से तैयार होने वाले मिट्टी के दीये, गगरी, पुरवा, हड़िया, ढकनी, परई और भड़ैया जैसे पारंपरिक बर्तन आज भी हमारी संस्कृति, आस्था और लोकजीवन का अभिन्न हिस्सा हैं। बदलते समय और बाजार में आधुनिक विकल्पों की बढ़ती मौजूदगी के बावजूद उनका परिवार इस पुश्तैनी हुनर को छोड़ने को तैयार नहीं है।

रेणु देवी बताती हैं कि दीपावली के लिए दीये और पूजन सामग्री बनाने की तैयारी चार से पांच महीने पहले ही शुरू हो जाती है। सबसे पहले आसपास से मिट्टी लाई जाती है। इसके बाद उसे कूटकर, साफ कर और अच्छी तरह गूंथकर काम लायक बनाया जाता है। तैयार मिट्टी को चाक पर रखकर हाथों की कुशलता से अलग-अलग आकार दिए जाते हैं। एक-एक दीये को आकार देने में मेहनत और सावधानी दोनों की जरूरत होती है। इसके बाद कच्चे दीयों और बर्तनों को धूप में सुखाया जाता है। पूरी तरह सूखने पर इन्हें भट्ठी में पकाया जाता है, तब जाकर ये बाजार में बिक्री के लिए तैयार हो पाते हैं।

महीनों की मेहनत, त्योहार पर टिकी उम्मीदें

कुम्हार परिवारों के लिए दीपावली केवल त्योहार नहीं, बल्कि पूरे साल की मेहनत का फल मिलने का अवसर भी है। इस दौरान मिट्टी के दीयों की मांग बढ़ने की उम्मीद में परिवार के सभी सदस्य उत्पादन में हाथ बंटाते हैं। महिलाओं की भूमिका इसमें बेहद महत्वपूर्ण होती है। मिट्टी तैयार करने से लेकर दीये बनाने, सुखाने और बिक्री के लिए सजाने तक वे हर चरण में जुटी रहती हैं। हालांकि, मेहनत के मुकाबले आमदनी और बाजार में उचित कीमत मिलना भी इनके सामने चुनौती बना रहता है।

चाक की थाप पर संवर रही दिवाली की परंपरा

नई पीढ़ी की बेरुखी से संकट में पुश्तैनी हुनर

रेणु देवी के सामने सबसे बड़ी चिंता इस पारंपरिक व्यवसाय के भविष्य को लेकर है। आधुनिक शिक्षा और रोजगार के नए अवसरों के कारण युवा पीढ़ी अब कुम्हारी से दूरी बना रही है। अधिकांश युवा सरकारी नौकरी और दूसरे व्यवसायों में अपना भविष्य तलाश रहे हैं। ऐसे में पीढ़ियों से चली आ रही मिट्टी के बर्तन बनाने की कला धीरे-धीरे सीमित होती जा रही है। इसके बावजूद रेणु देवी जैसी महिलाएं अपने हुनर और परिश्रम से इस विरासत को बचाने में जुटी हैं।

दीये खरीदना भी कारीगरों के सम्मान का जरिया

दीपावली पर मिट्टी के दीये जलाना केवल धार्मिक परंपरा निभाना नहीं, बल्कि स्थानीय कारीगरों की मेहनत को सम्मान देना भी है। बाजार में उपलब्ध बिजली की झालरों और अन्य सजावटी विकल्पों के बीच मिट्टी के दीयों की अपनी अलग पहचान और महत्व है। यदि लोग स्थानीय कुम्हार परिवारों से मिट्टी के दीये खरीदें तो इससे उनकी आजीविका को सहारा मिलेगा और पारंपरिक हस्तकला को भी नया जीवन मिलेगा। मिट्टी को आकार देकर दूसरों के घर रोशन करने वाले इन हाथों की मेहनत को पहचानना ही दीपावली की असली रोशनी और खुशियों का संदेश है।

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