(रणभेरी): भारतीय निशानेबाजी जगत के दिग्गज खिलाड़ी और पद्मश्री सम्मान से सम्मानित जसपाल राणा को शनिवार को वाराणसी के प्रसिद्ध मणिकर्णिका घाट पर अंतिम विदाई दी जाएगी। परिवार के अनुसार यह निर्णय उनकी स्वयं की इच्छा का सम्मान करते हुए लिया गया है। बताया गया कि उन्होंने जीवन में कई अवसरों पर इच्छा व्यक्त की थी कि उनके निधन के बाद अंतिम संस्कार काशी के मणिकर्णिका घाट पर किया जाए।
परिजनों ने जानकारी दी कि उनका पार्थिव शरीर शनिवार दोपहर विशेष विमान से वाराणसी पहुंचाया जाएगा, जिसके बाद पूरे राजकीय और पारिवारिक सम्मान के साथ अंतिम संस्कार की प्रक्रिया संपन्न होगी। इस दौरान खेल, राजनीति और सामाजिक क्षेत्र से जुड़े अनेक प्रतिष्ठित लोगों के शामिल होने की संभावना है।
बीमारी के बाद हुआ निधन
49 वर्षीय जसपाल राणा का शुक्रवार सुबह निधन हो गया। वह पिछले कई दिनों से दिल्ली स्थित एक निजी अस्पताल में उपचाराधीन थे। जानकारी के अनुसार जर्मनी से भारत लौटते समय विमान यात्रा के दौरान उनकी तबीयत अचानक बिगड़ गई थी, जिसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था। चिकित्सकों के लगातार प्रयासों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका। उनके निधन की खबर सामने आते ही खेल जगत में शोक की लहर दौड़ गई। देशभर के खिलाड़ियों, कोचों और खेल प्रशासकों ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।

गुरु को अंतिम विदाई देते समय भावुक हुईं मनु भाकर
ओलंपिक पदक विजेता निशानेबाज मनु भाकर अपने गुरु को श्रद्धांजलि देने के लिए शुक्रवार को ही देहरादून पहुंच गई थीं। अंतिम दर्शन के दौरान वह भावुक हो उठीं। जसपाल राणा के परिवार से मिलते समय उनकी आंखें नम हो गईं और उन्होंने अपने कोच को याद करते हुए गहरा दुख व्यक्त किया।
मनु भाकर की सफलता में जसपाल राणा की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। उन्होंने जूनियर स्तर से लेकर अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं तक मनु का मार्गदर्शन किया। विशेषज्ञों का मानना है कि हाल के वर्षों में मनु की उपलब्धियों के पीछे राणा की तकनीकी समझ और प्रशिक्षण का बड़ा योगदान रहा।
भारतीय शूटिंग के सबसे सफल खिलाड़ियों में शुमार
जसपाल राणा को भारतीय निशानेबाजी इतिहास के महान खिलाड़ियों में गिना जाता है। अपने लंबे खेल करियर में उन्होंने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में 600 से अधिक पदक हासिल किए।
साल 1994 में इटली के मिलान में आयोजित जूनियर विश्व शूटिंग प्रतियोगिता में उन्होंने स्वर्ण पदक जीतते हुए विश्व रिकॉर्ड स्थापित किया था। इसी वर्ष एशियाई खेलों में भी शानदार प्रदर्शन कर उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी अलग पहचान बनाई।
दोहा एशियाई खेलों में रचा था इतिहास
उनके करियर का सबसे यादगार अध्याय 2006 के दोहा एशियाई खेलों को माना जाता है। इस प्रतियोगिता में उन्होंने 25 मीटर सेंटर फायर पिस्टल स्पर्धा में विश्व स्तर के बराबरी वाले स्कोर के साथ शानदार प्रदर्शन किया था।
उस एशियाड में उन्होंने तीन स्वर्ण और एक रजत पदक जीतकर भारतीय दल को बड़ी सफलता दिलाई थी। यह उपलब्धि आज भी भारतीय शूटिंग इतिहास की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में गिनी जाती है।
राजनीति में भी निभाई सक्रिय भूमिका
खेल जगत में पहचान बनाने के बाद जसपाल राणा राजनीति से भी जुड़े। वर्ष 2009 में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार के रूप में लोकसभा चुनाव लड़ा था। हालांकि चुनावी सफलता उन्हें नहीं मिल सकी।
इसके बाद उन्होंने कांग्रेस का दामन थाम लिया और पार्टी गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाई। राजनीतिक जीवन के दौरान उन्होंने कई महत्वपूर्ण नेताओं के साथ काम किया और सामाजिक मुद्दों पर भी अपनी भागीदारी दर्ज कराई।
राहुल गांधी से विशेष संबंध
राजनीतिक जीवन में आने से पहले ही उनकी पहचान कई प्रमुख नेताओं से थी। बताया जाता है कि कांग्रेस नेता राहुल गांधी के साथ उनकी मित्रता निशानेबाजी के साझा शौक के कारण विकसित हुई थी। बाद के वर्षों में दोनों कई सार्वजनिक कार्यक्रमों में साथ दिखाई दिए।
उनके निधन पर राहुल गांधी ने भी शोक व्यक्त करते हुए भारतीय खेल जगत में उनके योगदान को याद किया और परिवार के प्रति संवेदना प्रकट की।
परिवार का राजनीति और खेल से गहरा जुड़ाव
जसपाल राणा का परिवार लंबे समय से खेल और राजनीति दोनों क्षेत्रों से जुड़ा रहा है। उनके पिता नारायण सिंह राणा इंडो-तिब्बतन बॉर्डर पुलिस (आईटीबीपी) में सेवा दे चुके हैं। बाद में उन्होंने सार्वजनिक जीवन में भी सक्रिय भूमिका निभाई।
परिवार के अन्य सदस्य भी निशानेबाजी से जुड़े रहे हैं। उनकी बहन और भाई दोनों राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी रहे हैं, जिससे घर में खेलों का वातावरण शुरू से मौजूद था।
राजनाथ सिंह परिवार से भी है रिश्ता
जसपाल राणा का परिवार देश के प्रमुख राजनीतिक परिवारों से भी जुड़ा रहा है। उनकी बहन सुषमा सिंह का विवाह उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ नेता और वर्तमान में प्रमुख राजनीतिक पद पर कार्यरत परिवार में हुआ है। इस कारण उनका परिवार राष्ट्रीय राजनीति के कई बड़े नामों से भी निकटता रखता था।
बचपन में शुरू हुआ था निशानेबाजी का सफर
28 जून 1976 को उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में जन्मे जसपाल राणा का बचपन खेलों के माहौल में बीता। उनके पिता स्वयं निशानेबाजी के प्रति रुचि रखते थे और उन्होंने कम उम्र में ही बेटे को इस खेल से परिचित कराया।
बताया जाता है कि लगभग दस वर्ष की आयु में ही उन्होंने पहली बार पिस्टल थामी थी। इसके बाद उनका अधिकांश समय अभ्यास और प्रशिक्षण में बीतने लगा। यही समर्पण आगे चलकर उन्हें देश के सबसे सफल निशानेबाजों में शामिल करने का आधार बना।
छोड़ गए प्रेरणा की अमिट विरासत
जसपाल राणा केवल एक खिलाड़ी नहीं थे, बल्कि नई पीढ़ी के खिलाड़ियों के मार्गदर्शक भी थे। उन्होंने अपने खेल जीवन में अनेक रिकॉर्ड बनाए, देश को गौरवान्वित किया और कई प्रतिभाशाली निशानेबाज तैयार किए।
उनके निधन से भारतीय खेल जगत ने एक ऐसे व्यक्तित्व को खो दिया है जिसने अपने प्रदर्शन, अनुशासन और प्रशिक्षण के माध्यम से निशानेबाजी को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनके पदक, उपलब्धियां और शिष्य आने वाली पीढ़ियों को लंबे समय तक प्रेरित करते रहेंगे।
