आईआईटी-बीएचयू के शोधकर्ताओं की नई पहल: घरेलू कचरे को 30 दिनों में खाद बनाने वाला बायो-कन्वर्टर तैयार

आईआईटी-बीएचयू के शोधकर्ताओं की नई पहल: घरेलू कचरे को 30 दिनों में खाद बनाने वाला बायो-कन्वर्टर तैयार

वाराणसी (रणभेरी) : घरों से निकलने वाले जैविक कचरे के निपटान की समस्या का समाधान खोजने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए आईआईटी-बीएचयू के जैव रासायनिक अभियंत्रिकी विभाग के शोधकर्ताओं ने एक विशेष बायो-कन्वर्टर डस्टबिन विकसित किया है। यह उपकरण रसोई से निकलने वाले जैविक अपशिष्ट को अपेक्षाकृत कम समय में उपयोगी जैविक खाद में बदलने में सक्षम बताया जा रहा है।

विभाग से जुड़े वैज्ञानिक डॉ. अभिषेक सुरेश ढोबले के अनुसार, बड़े स्तर पर जैविक कचरे के प्रबंधन और खाद निर्माण के लिए विभिन्न तकनीकें पहले से मौजूद हैं, लेकिन घरेलू उपयोग को ध्यान में रखकर विकसित किया गया यह समाधान अपनी तरह का एक अलग और व्यावहारिक प्रयास है। इसका उद्देश्य लोगों को घर पर ही कचरे का प्रबंधन करने के लिए सरल विकल्प उपलब्ध कराना है।

पारंपरिक प्रक्रिया की तुलना में कम समय

जानकारी के अनुसार, सामान्य परिस्थितियों में फल और सब्जियों के छिलके, बचा हुआ भोजन तथा अन्य जैविक अवशेषों को पूरी तरह खाद में बदलने में लगभग तीन महीने तक का समय लग सकता है। लेकिन नई तकनीक से तैयार किए गए इस बायो-कन्वर्टर में यही प्रक्रिया करीब 30 दिनों में पूरी हो जाती है।

शोधकर्ताओं का कहना है कि इस उपलब्धि के पीछे नियंत्रित ऑक्सीजन आपूर्ति की विशेष व्यवस्था प्रमुख भूमिका निभाती है। डस्टबिन के भीतर ऐसा वातावरण तैयार किया गया है जिससे जैविक पदार्थों का विघटन अधिक तेजी से हो सके और खाद बनने की प्रक्रिया में लगने वाला समय काफी कम हो जाए।

कई चरणों में किए गए परीक्षण

शुरुआती अनुसंधान के दौरान वैज्ञानिकों ने विभिन्न प्रकार के कंटेनरों का उपयोग कर परीक्षण किए। प्रारंभिक प्रयोग प्लास्टिक के पात्रों में किए गए थे। हालांकि आगे के अध्ययन में यह आशंका सामने आई कि लंबे समय तक उपयोग की स्थिति में खाद की गुणवत्ता पर प्रभाव पड़ सकता है या उसमें अवांछित सूक्ष्म तत्वों की मौजूदगी की संभावना बन सकती है।

इसी कारण बाद के चरणों में स्टील के कंटेनरों तथा मिट्टी से बने बर्तनों पर प्रयोग किए गए। परीक्षणों के आधार पर ऐसी संरचना विकसित की गई जिसमें खाद निर्माण की प्रक्रिया अधिक प्रभावी और सुरक्षित ढंग से संचालित हो सके।

आईआईटी-बीएचयू के शोधकर्ताओं की नई पहल: घरेलू कचरे को 30 दिनों में खाद बनाने वाला बायो-कन्वर्टर तैयार

ऑक्सीजन आधारित तकनीक से बढ़ती है गति

इस विशेष डस्टबिन की बनावट सामान्य डस्टबिन से अलग है। इसमें छोटे-छोटे छिद्र बनाए गए हैं और एक विशेष एयर पाइप जोड़ा गया है। इस पाइप के माध्यम से साधारण एयर पंप या एक्वेरियम में उपयोग होने वाले ऑक्सीजन पंप से हवा की आपूर्ति की जा सकती है।

लगातार या नियंत्रित मात्रा में मिलने वाली ऑक्सीजन जैविक अपघटन की प्रक्रिया को सक्रिय बनाए रखती है। इससे सूक्ष्मजीव अधिक प्रभावी ढंग से कार्य करते हैं और कचरे का विघटन अपेक्षाकृत तेजी से होता है।

दुर्गंध नियंत्रण पर भी विशेष ध्यान

घरेलू स्तर पर कचरा प्रबंधन में सबसे बड़ी समस्या दुर्गंध को माना जाता है। इसे ध्यान में रखते हुए शोधकर्ताओं ने इस प्रणाली में कुछ विशेष जैव-रासायनिक तत्वों का उपयोग किया है। इनकी सहायता से कचरे के सड़ने के दौरान उत्पन्न होने वाली दुर्गंध को कम करने तथा विघटन प्रक्रिया को तेज करने में मदद मिलती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि घरेलू उपयोग के लिए ऐसी तकनीकें प्रभावी साबित होती हैं, तो लोगों की भागीदारी भी बढ़ेगी और कचरा प्रबंधन अधिक व्यवस्थित हो सकेगा।

तकनीक को मिला पेटेंट

शोध दल द्वारा विकसित इस नवाचार को हाल ही में पेटेंट स्वीकृति प्राप्त हुई है। पेटेंट मिलने के बाद अब इस तकनीक को व्यावसायिक स्तर पर उपलब्ध कराने की दिशा में प्रयास तेज किए जा रहे हैं।

शोधकर्ताओं के अनुसार, वर्तमान में इसके लिए निवेशकों और संभावित साझेदारों की तलाश की जा रही है ताकि उत्पादन और वितरण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा सके। तब तक संस्थान के स्टार्टअप प्लेटफॉर्म के माध्यम से इस नवाचार के बारे में लोगों को जानकारी देने और जागरूकता बढ़ाने का काम किया जाएगा।

घर-घर तक पहुंचाने की योजना

भविष्य की योजनाओं पर चर्चा करते हुए वैज्ञानिकों ने बताया कि नगर प्रशासन और स्मार्ट सिटी जैसी परियोजनाओं के सहयोग से इस तकनीक को व्यापक स्तर पर लोगों तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है। यदि बड़ी संख्या में परिवार अपने घरों में जैविक कचरे को स्वयं खाद में बदलने लगें, तो नगर निकायों पर कचरा निस्तारण का दबाव कम हो सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार की पहल न केवल कचरे की मात्रा कम करने में सहायक होगी, बल्कि शहरी क्षेत्रों में बढ़ती ठोस अपशिष्ट प्रबंधन की चुनौती से निपटने में भी उपयोगी साबित हो सकती है। इसके साथ ही लोगों को घर पर तैयार जैविक खाद उपलब्ध होगी, जिसका उपयोग बागवानी और पौधों की देखभाल में किया जा सकेगा।

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