वाराणसी (रणभेरी): निर्जला एकादशी के पावन अवसर पर गुरुवार को काशी नगरी शिवभक्ति और धार्मिक उत्साह से सराबोर दिखाई दी। प्राचीन परंपराओं और वैदिक अनुष्ठानों के बीच श्रद्धालुओं ने भगवान शिव के ज्योतिर्लिंग स्वरूप काशी विश्वनाथ मंदिर में 1008 कलशों के जल से विशेष अभिषेक किया। भोर से ही श्रद्धालुओं की भीड़ घाटों और मंदिर परिसर में जुटने लगी थी। हर-हर महादेव और बम-बम भोले के जयघोष से पूरा क्षेत्र गूंज उठा।
सुबह निर्धारित समय पर श्रद्धालुओं का समूह गंगा तट से जल लेकर मंदिर की ओर रवाना हुआ। भक्तों ने विभिन्न कलशों में गंगाजल भरकर धार्मिक यात्रा निकाली। यात्रा के दौरान श्रद्धालु भक्ति गीतों का गायन करते हुए आगे बढ़े और पूरे मार्ग में शिवमय वातावरण बना रहा। मंदिर पहुंचने के बाद वैदिक मंत्रोच्चार के बीच भगवान शिव का जलाभिषेक तथा रुद्राभिषेक संपन्न कराया गया।
इस धार्मिक आयोजन में विशेष रूप से चांदी के कलश आकर्षण का केंद्र रहे। श्रद्धालु विभिन्न पवित्र नदियों के जल से भरे कलश लेकर शोभायात्रा में सबसे आगे चल रहे थे। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार विभिन्न तीर्थों और नदियों के जल से भगवान का अभिषेक करना अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है। इस दौरान हजारों श्रद्धालुओं ने पूजा-अर्चना कर परिवार की सुख-समृद्धि और कल्याण की कामना की।
धार्मिक यात्रा लगभग दो किलोमीटर लंबे मार्ग से होकर निकली। शोभायात्रा में भगवान शिव और माता पार्वती के स्वरूप धारण किए कलाकारों ने भी सहभागिता की। पारंपरिक वेशभूषा में सजे कलाकारों ने धार्मिक धुनों और भजन-कीर्तन के बीच नृत्य प्रस्तुत कर श्रद्धालुओं का मन मोह लिया। कई कलाकार शिवगणों के स्वरूप में भी दिखाई दिए, जिससे यात्रा का आकर्षण और बढ़ गया।

यात्रा में महिलाओं की भागीदारी विशेष रूप से उल्लेखनीय रही। शहर के विभिन्न क्षेत्रों से बड़ी संख्या में महिलाएं पीले और पारंपरिक परिधानों में शामिल हुईं। उन्होंने मिट्टी और धातु के कलशों में गंगाजल भरकर भगवान शिव को अर्पित करने का संकल्प लिया। अनेक महिलाओं ने निर्जला व्रत रखते हुए पूरी श्रद्धा के साथ इस धार्मिक अनुष्ठान में हिस्सा लिया।
आयोजन से जुड़े पदाधिकारियों के अनुसार यह परंपरा कई वर्षों से निरंतर निभाई जा रही है। इसका उद्देश्य धार्मिक चेतना को बढ़ावा देना, सनातन परंपराओं का संरक्षण करना तथा समाज में आध्यात्मिक जागरूकता फैलाना है। हर वर्ष निर्जला एकादशी पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु इस आयोजन का हिस्सा बनते हैं।
निर्जला एकादशी का धार्मिक महत्व
हिंदू धर्म में निर्जला एकादशी को वर्ष की सबसे महत्वपूर्ण एकादशियों में गिना जाता है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धापूर्वक व्रत और भगवान विष्णु की उपासना करने से सभी एकादशियों के समान पुण्य फल प्राप्त होता है। व्रती सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करते हैं और पूरे दिन बिना अन्न तथा जल ग्रहण किए उपवास रखते हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन भगवान शिव और भगवान विष्णु दोनों की आराधना का विशेष महत्व होता है। श्रद्धालु मानते हैं कि पवित्र नदियों का जल अर्पित करने से भगवान शीघ्र प्रसन्न होते हैं और जीवन में सुख, शांति तथा समृद्धि प्रदान करते हैं।

व्रत और पूजन की प्रमुख विधि
निर्जला एकादशी के दिन प्रातःकाल स्नान कर व्रत का संकल्प लिया जाता है। इसके बाद भगवान विष्णु की विधिवत पूजा की जाती है। पूजा के समय पीले वस्त्र धारण करना शुभ माना जाता है। भगवान को पीले पुष्प, फल और मिठाई अर्पित की जाती है। श्रद्धालु “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करते हैं तथा धार्मिक कथा का श्रवण करते हैं।
पूजन के उपरांत जल से भरा कलश स्थापित कर उसे वस्त्र से ढका जाता है। परंपरा के अनुसार कलश के साथ दक्षिणा और अन्य पूजन सामग्री का दान भी किया जाता है। अगले दिन द्वादशी तिथि में व्रत का पारण कर धार्मिक अनुष्ठान पूर्ण किया जाता है।
निर्जला एकादशी के अवसर पर काशी में आयोजित इस भव्य धार्मिक आयोजन ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक विरासत आज भी समाज के जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। पूरे दिन मंदिर परिसर और आसपास के क्षेत्रों में श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा तथा शिवभक्ति की अनूठी छटा देखने को मिली।
