मोहर्रम का चांद नजर आते ही वाराणसी में गम का माहौल, शिया इलाकों में शुरू हुईं मजलिसें

मोहर्रम का चांद नजर आते ही वाराणसी में गम का माहौल, शिया इलाकों में शुरू हुईं मजलिसें

वाराणसी (रणभेरी): इस्लामी कैलेंडर के पहले महीने मोहर्रम का चांद नजर आने के साथ ही वाराणसी के विभिन्न शिया बहुल क्षेत्रों में गम और श्रद्धा का वातावरण बन गया है। चांद दिखने के बाद शहर की गलियों में “या हुसैन” की सदाएं सुनाई देने लगीं और इसके साथ ही मजलिसों तथा मातमी कार्यक्रमों का सिलसिला शुरू हो गया।

मोहर्रम इस्लामिक परंपरा में विशेष महत्व रखता है। यह महीना इमाम हुसैन और कर्बला के शहीदों की याद से जुड़ा हुआ माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कर्बला की धरती पर इमाम हुसैन और उनके साथियों ने अपने सिद्धांतों, इंसाफ और मानवता की रक्षा के लिए संघर्ष किया और सर्वोच्च बलिदान दिया। इसी स्मृति में हर वर्ष दुनिया भर में उनके अनुयायी मोहर्रम के दिनों में गम और श्रद्धांजलि का इजहार करते हैं।

चांद दिखाई देने के साथ शुरू हुआ मातम का दौर

मंगलवार शाम मोहर्रम का चांद दिखाई देने के बाद वाराणसी के कई इलाकों में मजलिसों का आयोजन शुरू हो गया। शहर के दालमंडी, नई सड़क, कालीमहल, पितरकुंडा, लल्लापुरा, मदनपुरा, अर्दली बाजार, बाजारडीहा, रामनगर, मुखीमगंज, प्रहलाद घाट, चौहट्टा, दोषीपुरा, कोयला बाजार, पठानी टोला, हाड़ा सराय और सरैया समेत अन्य क्षेत्रों में लोग इमाम हुसैन की याद में एकत्रित होने लगे।

इन क्षेत्रों में जगह-जगह धार्मिक सभाओं का आयोजन किया जा रहा है, जहां कर्बला की घटना पर प्रकाश डाला जा रहा है और श्रद्धालु मातम तथा नौहा पढ़कर अपनी भावनाएं व्यक्त कर रहे हैं।

महिलाओं ने अपनाया सादगी और शोक का प्रतीक स्वरूप

मोहर्रम के अवसर पर शिया समुदाय की महिलाओं में भी शोक की परंपराएं दिखाई देने लगी हैं। समुदाय से जुड़े लोगों के अनुसार, महिलाएं इस दौरान सादगीपूर्ण जीवनशैली अपनाती हैं। कई महिलाएं शोक की परंपराओं के तहत रंगीन वस्त्रों और श्रृंगार से दूरी बनाकर रखती हैं तथा सामान्य रूप से काले रंग के कपड़े पहनना शुरू कर देती हैं।

धार्मिक मान्यता के अनुसार यह अवधि शोक और इमाम हुसैन के बलिदान को याद करने का समय मानी जाती है।

एक मोहर्रम को निकलेगा पारंपरिक जुलूस

शहर के सदर इमामबाड़ा, लाट सरैया से एक मोहर्रम के अवसर पर पारंपरिक जुलूस निकाला जाएगा। आयोजकों के अनुसार, हर वर्ष की तरह इस बार भी जुलूस में अलम और दुलदुल की प्रतीकात्मक शबीह शामिल की जाएगी।जुलूस के दौरान विभिन्न अंजुमनें नौहा और मातम पेश करेंगी। बड़ी संख्या में अकीदतमंदों के शामिल होने की संभावना जताई जा रही है। प्रशासनिक स्तर पर भी सुरक्षा और व्यवस्था को लेकर तैयारियां की जा रही हैं।

मोहर्रम का संदेश

मोहर्रम केवल शोक का महीना नहीं माना जाता, बल्कि इसे सत्य, इंसाफ, धैर्य और मानवता के मूल्यों की याद दिलाने वाला अवसर भी माना जाता है। इमाम हुसैन के बलिदान को लोग अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने और सच्चाई पर कायम रहने की प्रेरणा के रूप में देखते हैं।

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