NBW–82 CrPC के बाद भी आरोपी आज़ाद

NBW–82 CrPC के बाद भी आरोपी आज़ाद

अदालत के आदेश बनाम प्रशासन की जिद

• गैर-जमानती वारंट और उद्घोषणा के बाद भी गिरफ्तारी शून्य, शिवपुर पुलिस की कार्यशैली कठघरे में
• अग्रिम जमानत खारिज होने के बावजूद कार्रवाई नहीं, क्या न्यायालयी आदेशों की हो रही है अवहेलना?
• पुलिस की “नहीं मिले” रिपोर्ट से असंतुष्ट हुई अदालत, 82 CrPC लागू कर दिया सख्त संदेश
• अब मामला महिला सुरक्षा से आगे,न्यायिक सर्वोच्चता बनाम प्रशासनिक निष्क्रियता की कसौटी

वाराणसी (रणभेरी): वाराणसी के शिवपुर थाना क्षेत्र से जुड़े बलात्कार के एक प्रकरण में अब स्थिति साफ तौर पर अदालत और प्रशासन के आमने-सामने खड़े होने की बनती जा रही है। अंजलि (बदला हुआ नाम) बनाम निशांत सिंह व अन्य मामले में न्यायालय द्वारा गैर-जमानती वारंट और धारा 82 दंड प्रक्रिया संहिता के आदेश जारी होने के बावजूद आरोपियों की गिरफ्तारी न होना, पुलिस प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर रहा है।

एफआईआर संख्या 71/2024 के तहत दर्ज इस मामले में 4 फरवरी 2026 को न्यायालय ने शिकायतकर्ता की उपस्थिति में सुनवाई करते हुए पाया कि पहले जारी वारंटों के अनुपालन में थाना शिवपुर की ओर से दाखिल रिपोर्टें केवल औपचारिकता तक सीमित हैं। 23 दिसंबर 2025 और 8 जनवरी 2026 की पुलिस रिपोर्टों में यह कहकर पल्ला झाड़ लिया गया कि आरोपी “नहीं मिले”। न्यायालय ने इन रिपोर्टों को अपर्याप्त मानते हुए स्पष्ट आदेश दिया कि आरोपियों के विरुद्ध गैर-जमानती वारंट के साथ-साथ धारा 82 दंड प्रक्रिया संहिता के तहत उद्घोषणा की कार्रवाई की जाए।

यह आदेश अपने आप में यह संकेत देता है कि अदालत अब प्रशासनिक स्पष्टीकरणों से संतुष्ट नहीं है। धारा 82 दंड प्रक्रिया संहिता का प्रयोग तभी होता है जब न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि आरोपी जानबूझकर कानून से बच रहा है। इसके बावजूद गिरफ्तारी न होना, अदालत की मंशा और प्रशासन की कार्रवाई के बीच बढ़ती खाई को उजागर करता है।

मामले में यह तथ्य भी पहले से रिकॉर्ड पर है कि चार आरोपियों निशांत सिंह (उर्फ शिवम), शीतांशु सिंह (उर्फ सत्यम), बबीता सिंह और संजय सिंह में से निशांत सिंह और शीतांशु सिंह निवासी लक्ष्मणपुर, थाना शिवपुर, वाराणसी व मूल निवासी ग्राम कठवतिया, जौनपुर की अग्रिम जमानत याचिकाएं जिला अदालत से खारिज हो चुकी हैं। यानी गिरफ्तारी पर कोई कानूनी रोक नहीं है। फिर भी थाना शिवपुर द्वारा कोई ठोस कार्रवाई न किया जाना इस सवाल को जन्म देता है कि क्या न्यायालय के आदेशों को ज़मीन पर लागू करने की जिम्मेदारी प्रशासन निभा पा रहा है या नहीं।

पीड़ित पक्ष का आरोप है कि आरोपियों की खुलेआम मौजूदगी और परिवार को दी जा रही धमकियों के बावजूद पुलिस की निष्क्रियता बनी हुई है। ऐसे हालात में यह मामला केवल महिला सुरक्षा या एक एफआईआर तक सीमित नहीं रह जाता, बल्कि यह सीधे-सीधे न्यायालय की सर्वोच्चता बनाम प्रशासनिक उदासीनता का प्रश्न बन जाता है।

कानूनी जानकारों के अनुसार, यदि गैर-जमानती वारंट और 82 दंड प्रक्रिया संहिता जैसे आदेशों के बाद भी गिरफ्तारी नहीं होती, तो यह न्यायालयी आदेशों की अवहेलना की श्रेणी में आ सकता है। ऐसे मामलों में अदालत को संबंधित अधिकारियों से जवाब तलब करने और उनकी जवाबदेही तय करने का अधिकार भी है।

फिलहाल अगली सुनवाई 18 फरवरी 2026 को नियत है। यह तारीख केवल एक अगली पेशी नहीं, बल्कि यह तय करने वाली कसौटी बनती जा रही है कि कानून का आदेश प्रशासन पर भारी पड़ेगा या फिर प्रशासनिक निष्क्रियता न्यायालयी आदेशों को चुनौती देती रहेगी। यह मामला अब अदालत के आदेशों की वास्तविक ताकत और उनके क्रियान्वयन की परीक्षा बन चुका है।

शिवपुर पुलिस कर रही है न्यायालय की अवमानना

उत्तर प्रदेश राज्य बनाम निशांत सिंह वगैरह प्रकरण में न्यायालय द्वारा गैर-जमानती वारंट और धारा 82 दंड प्रक्रिया संहिता के आदेश जारी किए जाने के बाद भी गिरफ्तारी न होना, अब केवल प्रशासनिक शिथिलता का प्रश्न नहीं रह जाता, बल्कि यह न्यायालय की अवमानना के दायरे में प्रवेश करता प्रतीत होता है।

NBW और 82 CrPC का कानूनी महत्व

गैर-जमानती वारंट न्यायालय का वह आदेश होता है, जिसमें पुलिस को आरोपी को गिरफ्तार कर न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करने का स्पष्ट निर्देश दिया जाता है। यह विवेकाधीन नहीं, बल्कि अनिवार्य आदेश होता है।
वहीं, धारा 82 CrPC तब लागू की जाती है जब न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि आरोपी जानबूझकर गिरफ्तारी से बच रहा है या स्वयं को कानून से दूर रखे हुए है। इसका अर्थ यह है कि अदालत अब आरोपी को फरार मानने की स्थिति में पहुंच चुकी है।

सारनाथ पुलिस का शर्मनाक चेहरा

निशांत सिंह वगैरह प्रकरण से जुड़े संजय सिंह पर पुलिस की मेहरबानी कोइ पहली बार नहीं दिख रही। पूर्व में भी FIR नंबर 383/2024 में थाना सारनाथ द्वारा अभियुक्त संजय सिंह की गिरफ्तारी के पश्चात् पुलिस द्वारा थाने से छोड़े जाने का मामला चर्चा में रहा था, जिस पर पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर सवाल खड़े हुए थे।

पुलिस रिपोर्ट बनाम न्यायालय की संतुष्टि

इस मामले में पुलिस द्वारा 23 दिसंबर 2025 और 8 जनवरी 2026 को दी गई रिपोर्टों में केवल यह कहा गया कि आरोपी “नहीं मिले”। न्यायालय ने इन रिपोर्टों को अपर्याप्त मानते हुए 4 फरवरी 2026 को NBW के साथ 82 CrPC का आदेश पारित किया। कानूनी दृष्टि से, इसके बाद पुलिस के पास यह कहने का विकल्प शेष नहीं रहता कि आरोपी उपलब्ध नहीं हैं बल्कि गिरफ्तारी सुनिश्चित करना उसकी वैधानिक जिम्मेदारी बन जाती है।

अग्रिम जमानत खारिज होने का प्रभाव

रिकॉर्ड पर यह तथ्य मौजूद है कि निशांत सिंह और शीतांशु सिंह की अग्रिम जमानत याचिकाएं जिला अदालत से खारिज हो चुकी हैं। इसका सीधा अर्थ है कि गिरफ्तारी पर कोई न्यायिक रोक नहीं है। ऐसे में गिरफ्तारी न करना न केवल लापरवाही, बल्कि न्यायालयी आदेशों की अवहेलना मानी जा सकती है। यही यूपी पुलिस है जो चलती ट्रेन से भी फरार अपराधियों को गिरफ्तार कर लेती है, तो सवाल उठता है कि आखिर इस मामले में अभियुक्तगण को गिरफ्तार करने में पुलिस को कौन सी ताकत रोक रही है।

अवमानना की संभावित स्थिति

यदि NBW और 82 CrPC जैसे सख्त आदेशों के बावजूद पुलिस जानबूझकर या बिना ठोस कारण के गिरफ्तारी नहीं करती, तो यह Contempt of Courts Act के अंतर्गत न्यायिक आदेश के पालन में बाधा की श्रेणी में आ सकता है।
ऐसी स्थिति में न्यायालय को यह अधिकार प्राप्त है कि वह:
• संबंधित पुलिस अधिकारियों से स्पष्टीकरण तलब करे
• उनकी जवाबदेही तय करे
• और आवश्यकता पड़ने पर अवमानना की कार्यवाही प्रारंभ करे

अदालत बनाम प्रशासन की संवैधानिक कसौटी

यह प्रकरण अब इस मूल प्रश्न पर आ टिकता है कि क्या प्रशासन न्यायालय के आदेशों को लागू करने में सक्षम और इच्छुक है। यदि न्यायालय के स्पष्ट आदेश ज़मीन पर लागू नहीं होते, तो यह केवल एक मामले की विफलता नहीं, बल्कि न्यायिक सर्वोच्चता को चुनौती देने जैसी स्थिति बन जाती है। अगली सुनवाई 18 फरवरी 2026 को नियत है। यह तारीख तय करेगी कि मामला प्रशासनिक लापरवाही तक सीमित रहेगा या फिर न्यायालय इसे अवमानना की दिशा में ले जाने के लिए विवश होगा।

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