हां…मैं शंकराचार्य हूं, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने आठ पन्नों में लिख भेजा प्रशासन को जवाब

हां…मैं शंकराचार्य हूं, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने आठ पन्नों में लिख भेजा प्रशासन को जवाब

(रणभेरी): मौनी अमावस्या के पावन स्नान को लेकर प्रयागराज माघ मेला क्षेत्र में शुरू हुआ विवाद अब प्रशासनिक दायरे से निकलकर शंकराचार्य की पदवी और संवैधानिक अधिकारों तक जा पहुंचा है। ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और मेला प्रशासन आमने-सामने हैं, वहीं संत समाज का एक बड़ा वर्ग खुलकर शंकराचार्य के समर्थन में उतर आया है।

नोटिस के जवाब में 8 पेज का पलटवार

मेला प्रशासन की ओर से जारी नोटिस के जवाब में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने 24 घंटे के भीतर ई-मेल के माध्यम से आठ पृष्ठों का विस्तृत प्रत्युत्तर भेजा है। इसमें नोटिस को मनमाना, दुर्भावनापूर्ण और असंवैधानिक करार दिया गया है। शंकराचार्य का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा कोई आदेश नहीं दिया है, जिससे उन्हें शंकराचार्य पद पर बने रहने से रोका गया हो। चूंकि मामला न्यायालय में विचाराधीन है, ऐसे में किसी भी तीसरे पक्ष-चाहे वह प्रशासन ही क्यों न हो-को टिप्पणी करने या हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है। उन्होंने नोटिस तत्काल वापस लेने की मांग करते हुए चेतावनी दी है कि अन्यथा वे मानहानि का मुकदमा दायर करेंगे। दरअसल, मेला प्रशासन ने सुप्रीम कोर्ट के 14 अक्टूबर 2022 के एक आदेश का हवाला देते हुए यह स्पष्ट करने को कहा था कि उन्होंने स्वयं को शंकराचार्य कैसे घोषित किया।

हां…मैं शंकराचार्य हूं, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने आठ पन्नों में लिख भेजा प्रशासन को जवाब

मौनी अमावस्या के दिन कैसे भड़का विवाद

रविवार को मौनी अमावस्या के अवसर पर शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पालकी में सवार होकर गंगा स्नान के लिए जा रहे थे। इसी दौरान पुलिस ने पालकी रोक दी और पैदल जाने का निर्देश दिया। विरोध करने पर शिष्यों के साथ धक्का-मुक्की की गई। इस घटना से आक्रोशित शंकराचार्य अपने शिविर के बाहर धरने पर बैठ गए। इसके बाद सोमवार देर रात मेला प्रशासन के एक अधिकारी नोटिस लेकर शिविर पहुंचे, लेकिन शिष्यों ने रात का हवाला देते हुए नोटिस लेने से इनकार कर दिया। मंगलवार सुबह नोटिस शिविर के गेट पर चस्पा कर दिया गया।

हां…मैं शंकराचार्य हूं, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने आठ पन्नों में लिख भेजा प्रशासन को जवाब

संत समाज में नाराजगी

द्वारका पीठ के शंकराचार्य स्वामी सदानंद महाराज ने इस पूरे घटनाक्रम की तीखी निंदा की है। उन्होंने कहा कि प्रशासन को सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी चाहिए। स्वामी सदानंद महाराज ने आरोप लगाया कि पुलिस ने ब्राह्मणों की शिखा पकड़कर घसीटा, जो धार्मिक मर्यादाओं का घोर अपमान है। उन्होंने इसे शासन का अहंकार बताते हुए कहा कि सत्ता स्थायी नहीं होती और उसका दुरुपयोग नहीं होना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि गंगा स्नान से किसी संत को रोकना गंभीर पाप के समान है। उल्लेखनीय है कि स्वामी सदानंद महाराज और स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद दोनों ही ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के शिष्य हैं और उनके निधन के बाद दोनों शंकराचार्य पद पर प्रतिष्ठित हुए।

समर्थन में उतरे साधु-संत और नेता

मृत्युंजय धाम के महामंडलेश्वर मृत्युंजय पुरी ने गौ प्रतिष्ठा प्रेरणा यात्रा के दौरान शंकराचार्य से भेंट कर अपना समर्थन जताया। वहीं कांग्रेस नेत्री पूनम पंडित भी माघ मेले में पहुंचीं और प्रशासन की कार्रवाई पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि महाकुंभ जैसे आयोजनों में इस तरह के नोटिस नहीं लगाए गए, फिर अब संतों के साथ ऐसा व्यवहार क्यों किया जा रहा है। उन्होंने सत्ता में बैठे लोगों पर सनातन धर्म की उपेक्षा का आरोप लगाया।

माघ मेले में व्यवस्थाएं जारी

इधर, माघ मेले में श्रद्धालुओं का आवागमन लगातार जारी है। दोपहिया वाहनों को घाट से लगभग 300 मीटर पहले रोका जा रहा है, जबकि कार सवार श्रद्धालुओं के लिए 500 मीटर दूर पार्किंग की व्यवस्था की गई है। फिलहाल यह विवाद न्यायिक प्रक्रिया, प्रशासनिक निर्णय और धार्मिक अस्मिता के सवालों के बीच फंसा हुआ है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रशासन अपने रुख में बदलाव करता है या मामला अदालत में और गहराता है।

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