वाराणसी (रणभेरी): संसद भवन परिसर में सांसद पप्पू यादव द्वारा भगवा वस्त्र धारण कर किए गए विरोध प्रदर्शन को लेकर धार्मिक और राजनीतिक बहस तेज हो गई है। इस मामले पर अब काशी के प्रमुख संतों के साथ-साथ अधिवक्ता समुदाय ने भी कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। संत समाज का कहना है कि भगवा वस्त्र सनातन परंपरा, त्याग और तपस्या का प्रतीक है तथा इसका राजनीतिक विरोध-प्रदर्शन के लिए उपयोग धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला कदम है।
इस पूरे घटनाक्रम के बाद संतों ने सांसद पप्पू यादव के अलावा कांग्रेस नेता राहुल गांधी और समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव की भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं। वहीं वाराणसी में अधिवक्ताओं ने विरोध प्रदर्शन कर राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन सौंपते हुए संबंधित सांसदों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई की मांग की है।
भगवा वस्त्र की मर्यादा बनाए रखने की अपील
काशी सुमेरू पीठ के शंकराचार्य स्वामी नरेन्द्रानंद सरस्वती ने मीडिया से बातचीत में कहा कि भगवा रंग केवल एक वस्त्र नहीं बल्कि त्याग, तप, वैराग्य और सनातन संस्कृति का प्रतीक माना जाता है। उनका कहना था कि इस पवित्र परिधान का राजनीतिक विरोध या प्रदर्शन के लिए इस्तेमाल करना उचित नहीं है और इससे अनेक लोगों की धार्मिक भावनाएं प्रभावित हो सकती हैं।
उन्होंने संसद की कार्यवाही में व्यवधान डालने को भी लोकतांत्रिक परंपराओं के विपरीत बताते हुए कहा कि जनप्रतिनिधियों को सदन की गरिमा बनाए रखनी चाहिए। उनके अनुसार संसद संवाद और लोकतांत्रिक चर्चा का मंच है, जहां विरोध भी मर्यादित तरीके से होना चाहिए।
अयोध्या प्रकरण का भी किया उल्लेख
स्वामी नरेन्द्रानंद सरस्वती ने बातचीत के दौरान अयोध्या से जुड़े हालिया विवादों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि संबंधित मामलों की जांच विशेष जांच दल (एसआईटी) द्वारा की जा रही है और जांच पूरी होने के बाद दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
उन्होंने यह भी कहा कि बिना जांच पूरी हुए किसी पुजारी को चोरी जैसे आरोपों का दोषी बताना उचित नहीं है। उनका आरोप था कि कुछ लोग जानबूझकर संत समाज और भगवा परंपरा की छवि खराब करने का प्रयास कर रहे हैं।
नेताओं पर लगाए गंभीर आरोप
शंकराचार्य ने सांसद पप्पू यादव और समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव पर निशाना साधते हुए कहा कि उनकी राम मंदिर के प्रति वास्तविक आस्था नहीं है और वे राजनीतिक उद्देश्य से ऐसे मुद्दे उठा रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि भगवा वस्त्र पहनकर संसद परिसर में प्रदर्शन करना उसकी गरिमा के अनुकूल नहीं है।
उन्होंने अपने वक्तव्य में पौराणिक प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि जिस प्रकार कालनेमी ने साधु का वेश धारण कर भ्रम फैलाने का प्रयास किया था, उसी प्रकार धार्मिक प्रतीकों का राजनीतिक उपयोग भी लोगों की आस्था के साथ छल जैसा प्रतीत होता है। उनके अनुसार भगवा वस्त्र किसी दल या नेता की राजनीतिक छवि सुधारने का माध्यम नहीं, बल्कि सनातन परंपरा और त्याग का प्रतीक है।

वाराणसी में अधिवक्ताओं का प्रदर्शन
इस विवाद के बीच वाराणसी में अधिवक्ताओं ने भी विरोध प्रदर्शन किया। पुलिस कमिश्नर कार्यालय के बाहर एकत्र होकर उन्होंने नारेबाजी की और राष्ट्रपति के नाम संबोधित ज्ञापन सौंपा। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि संसद परिसर में भगवा वस्त्र पहनकर किया गया प्रदर्शन सनातन धर्म का अपमान है और इस पूरे मामले की जांच कर उचित कार्रवाई की जानी चाहिए।
अधिवक्ताओं ने बताया कि उन्होंने कैंट थाने तथा पुलिस कमिश्नर कार्यालय में भी प्रार्थना-पत्र देकर सांसद पप्पू यादव, राहुल गांधी सहित उन अन्य सांसदों के विरुद्ध मुकदमा दर्ज करने की मांग की है, जो उनके अनुसार इस प्रदर्शन में शामिल थे। उनका दावा है कि यह विरोध देशभर के सनातन धर्मावलंबियों की भावनाओं से जुड़ा विषय है और इसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए।
राजनीतिक हलकों में जारी है बहस
संसद परिसर में हुए इस प्रदर्शन के बाद राजनीतिक और धार्मिक दोनों स्तरों पर बयानबाजी तेज हो गई है। एक ओर संत समाज और अधिवक्ता संगठन इस घटना को धार्मिक परंपराओं के सम्मान से जोड़कर देख रहे हैं, वहीं इस मुद्दे पर विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच भी आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है। आने वाले दिनों में इस मामले को लेकर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं और तेज होने की संभावना जताई जा रही है।
