वाराणसी (रणभेरी): मोहर्रम की तीसरी तारीख पर शहर में अकीदत और गम के माहौल के बीच नवाब की ड्योढ़ी से पारंपरिक मन्नती दुलदुल का जुलूस निकाला गया। औसानगंज स्थित नवाब की ड्योढ़ी से शुरू हुआ यह जुलूस इस बार विशेष चर्चा का विषय बना, क्योंकि दालमंडी क्षेत्र में हुए ध्वस्तीकरण के बाद यह पहला अवसर था जब दुलदुल का जुलूस उसी मार्ग से होकर गुजरा।
जुलूस में बड़ी संख्या में अकीदतमंद शामिल हुए। नौहाख्वानी और मातम के बीच लोग कर्बला के शहीदों को याद करते हुए आगे बढ़ते रहे। जुलूस के संचालन की जिम्मेदारी अंजुमन जव्वादिया ने निभाई। पूरे मार्ग में शोक और श्रद्धा का वातावरण बना रहा।
मजलिस के साथ हुई जुलूस की शुरुआत
दुलदुल के जुलूस के प्रस्थान से पूर्व इमामबाड़े में मजलिस का आयोजन किया गया। मजलिस को संबोधित करते हुए मौलाना ने कर्बला की घटना का उल्लेख किया और इमाम हुसैन की शहादत पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि इमाम हुसैन मोहर्रम की दूसरी तारीख को कर्बला पहुंचे थे और बाद में इसी धरती पर 10 मोहर्रम, 61 हिजरी को उन्हें तथा उनके साथियों को शहीद कर दिया गया था।
मौलाना के बयान के दौरान उपस्थित लोग भावुक हो उठे और मजलिस का माहौल गमगीन हो गया। इसके बाद दुलदुल को सजाकर जुलूस रवाना किया गया।
तीन घंटे में तय हुई 650 मीटर की दूरी
जुलूस जब दालमंडी क्षेत्र में पहुंचा तो रास्ते के दोनों ओर ध्वस्त इमारतों के अवशेष दिखाई दे रहे थे। चौक से नई सड़क तक लगभग 650 मीटर का मार्ग तय करने में जुलूस को करीब तीन घंटे का समय लगा। रास्ते में कई स्थानों पर नौहाख्वानी और मातम का सिलसिला चलता रहा।
श्रद्धालुओं ने जगह-जगह जुलूस का स्वागत किया और दुलदुल को दूध तथा मलीदा पेश किया। काशीपुरा, नारियल बाजार, दालमंडी, नई सड़क, कालीमहल और पितरकुंडा होते हुए यह जुलूस लल्लापुरा स्थित दरगाह फातमान पहुंचा, जहां अल सुबह इसे समाप्त किया गया।
एक सदी पुरानी परंपरा आज भी कायम
नवाब की ड्योढ़ी से निकलने वाले इस ऐतिहासिक जुलूस का इतिहास लगभग सौ वर्ष पुराना बताया जाता है। आयोजन से जुड़े मेहंदी बख्त ने जानकारी दी कि इस परंपरा की शुरुआत उनके पूर्वज मिर्जा कामरान बख्त ने की थी। उन्होंने बताया कि उनके द्वारा स्थापित इमामबाड़ा भी लगभग एक शताब्दी पुराना है और तब से लगातार मोहर्रम के अवसर पर यह जुलूस निकाला जा रहा है।

उन्होंने कहा कि वर्षों से इस आयोजन की व्यवस्थाएं परिवार की ओर से की जाती रही हैं। साथ ही छह मोहर्रम को निकलने वाला दुलदुल भी इसी इमामबाड़े में पहुंचता है, जहां उसकी रस्में अदा की जाती हैं।
अंजुमन जव्वादिया ने निभाई अहम भूमिका
जुलूस के दौरान अंजुमन जव्वादिया के सदस्यों ने पारंपरिक अंदाज में नौहाख्वानी और मातम किया। अंजुमन के नेतृत्व में पूरा काफिला अनुशासित ढंग से अपने निर्धारित मार्ग पर आगे बढ़ता रहा। कर्बला के शहीदों की याद में पढ़े गए नौहों ने माहौल को और अधिक भावुक बना दिया।
शिवाला के कुम्हार इमामबाड़े में भी रही रौनक
मोहर्रम की तीसरी तारीख पर शहर के शिवाला क्षेत्र स्थित कुम्हार इमामबाड़े में भी धार्मिक गतिविधियां जारी रहीं। यहां आलिम हुसैन के नेतृत्व में आयोजित कार्यक्रम में विशेष ताजिया रखा गया, जिसकी बनावट मंदिरनुमा शैली में तैयार की गई है।

इमामबाड़ा प्रबंधन के अनुसार नौ मोहर्रम को यह ताजिया आम श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए खोला जाएगा। वहीं प्रतिदिन मजलिसों का आयोजन भी जारी है। शनिवार को सुबह 11 बजे आयोजित मजलिस में बड़ी संख्या में लोगों ने भाग लिया और कर्बला के शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की।
पूरे शहर में दिखाई दिया गम और अकीदत का माहौल
मोहर्रम की तीसरी तारीख पर वाराणसी के विभिन्न इलाकों में मजलिसों, नौहाख्वानी और मातमी जुलूसों का सिलसिला जारी रहा। नवाब की ड्योढ़ी से निकला मन्नती दुलदुल का जुलूस न केवल अपनी ऐतिहासिक परंपरा के कारण महत्वपूर्ण रहा, बल्कि दालमंडी मार्ग से उसके गुजरने को लेकर भी लोगों में विशेष उत्सुकता देखने को मिली। पूरे आयोजन के दौरान श्रद्धालुओं ने कर्बला के शहीदों को याद करते हुए शोक और सम्मान प्रकट किया।
