वाराणसी (रणभेरी): गोवर्धन पीठ के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती ने कहा है कि भारत को तोड़ने की कोई भी कोशिश कभी कामयाब नहीं होगी। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि भारत की मूल पहचान हिंदू राष्ट्र के रूप में है और भविष्य में इसे औपचारिक रूप से उसी रूप में स्वीकार किया जाएगा। उन्होंने यह भी जोड़ा कि देश को विभाजित करने की सोच रखने वाले लोग अंततः स्वयं ही बिखर जाएंगे।
अस्सी क्षेत्र स्थित दक्षिणामूर्ति मठ में अपने प्रवास के दौरान आयोजित एक चर्चा कार्यक्रम में उन्होंने श्रद्धालुओं के सवालों का जवाब देते हुए समाज के विभिन्न वर्गों पर भी विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि अनुसूचित जाति और वंचित वर्गों को बिना समुचित समझ के विरोधी मान लिया गया है, जबकि प्राचीन शास्त्रों में ऐसे शब्दों का उल्लेख नहीं मिलता। उनके अनुसार शास्त्रों में “अंत्यज” शब्द मिलता है, जो समाज के अंतिम अंग का संकेत करता है, लेकिन इसका अर्थ भेदभाव नहीं बल्कि अपनत्व और संरक्षण से जुड़ा है।
उन्होंने आगे कहा कि समाज व्यवस्था का उद्देश्य हर व्यक्ति की आवश्यकताओं के अनुरूप संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित करना है। रामराज्य के संदर्भ में उन्होंने कहा कि लोग उसकी प्रशंसा तो करते हैं, लेकिन उसकी मूल व्यवस्था को अपनाने में संकोच करते हैं। देश और धर्म की सेवा के विषय में उन्होंने सुझाव दिया कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने घर से एक ईंट और एक रुपया निकालकर अपने निकट के मंदिर या मठ को देना चाहिए। उनके अनुसार यही सच्ची राष्ट्रसेवा का रूप है।
इससे पहले अस्सी घाट से दक्षिणामूर्ति मठ तक भगवान दक्षिणामूर्ति की 101 कलशों के साथ शोभायात्रा निकाली गई। आगामी 23 अप्रैल से नए मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा का कार्यक्रम शुरू होगा। मंदिर से जुड़े पदाधिकारियों ने बताया कि श्रीदक्षिणामूर्ति मंदिर अत्यंत प्राचीन है और इसके पुनरुद्धार के बाद यहां भगवान शिव के स्वरूप दक्षिणामूर्ति की स्थापना की गई है। मंदिर परिसर में शिवलिंग के साथ माता पार्वती, गणेश, कार्तिकेय और नंदी की प्रतिमाएं स्थापित की जाएंगी, साथ ही भगवान हनुमान की प्रतिमा भी स्थापित करने की योजना है।
