(रणभेरी): शहर कोतवाली क्षेत्र में वर्ष 2019 में हुए चर्चित अधिवक्ता समीर सैफी हत्याकांड में अदालत ने सख्त फैसला सुनाते हुए तीन आरोपियों को मृत्युदंड और एक आरोपी को सात वर्ष के कारावास की सजा सुनाई है। यह फैसला अपर जिला एवं सत्र न्यायालय/फास्ट ट्रैक कोर्ट संख्या-3 के पीठासीन अधिकारी रवि कुमार दिवाकर ने सुनाया।
क्या था पूरा मामला
शहर के लद्दावाला निवासी 28 वर्षीय समीर सैफी 15 अक्टूबर 2019 की शाम रहस्यमय परिस्थितियों में लापता हो गए थे। परिजनों की शिकायत के बाद पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू की। चार दिन बाद, 19 अक्टूबर को भोपा क्षेत्र के सीकरी गांव में उनका शव बरामद हुआ, जिससे मामले ने गंभीर रूप ले लिया।
पुलिस जांच में सामने आया कि करीब 40 लाख रुपये के लेन-देन को लेकर विवाद चल रहा था। समीर अपने पैसे वापस मांग रहे थे, लेकिन आरोपियों ने भुगतान से इनकार कर दिया। इसी विवाद के चलते उन्हें अगवा कर हत्या की साजिश रची गई।
हत्या की साजिश कैसे रची गई
जांच के अनुसार, आरोपियों ने समीर को कार में बैठाकर सीकरी स्थित एक फार्महाउस पर ले जाया। वहां रस्सी से गला घोंटकर उनकी हत्या कर दी गई और शव को मिट्टी में दबा दिया गया। घटना में इस्तेमाल कार मुख्य आरोपी सिंगोल अल्वी की बताई गई, जबकि सोनू उर्फ रिजवान ड्राइवर था और अन्य आरोपी उसके सहयोगी थे।
अदालत में क्या हुआ
अभियोजन पक्ष ने छह गवाह पेश किए, जिनके आधार पर अदालत ने आरोपियों को दोषी करार दिया।
- सोनू उर्फ रिजवान, सिंगोल अल्वी और शालू उर्फ अरबाज को अपहरण, हत्या, साजिश और साक्ष्य मिटाने का दोषी मानते हुए फांसी की सजा दी गई।
- दिनेश को केवल साक्ष्य मिटाने का दोषी पाया गया, जिसके लिए उसे सात साल की सजा सुनाई गई।
घटना से जुड़ी अहम बातें
- समीर हाल ही में अधिवक्ता बने थे और बार काउंसिल में पंजीकरण कराया था।
- घटना वाले दिन ही उन्होंने कचहरी में अपने चैंबर का उद्घाटन किया था।
- जांच में यह भी सामने आया कि हत्या से पहले सुबह लेन-देन को लेकर विवाद हुआ था।
केस की टाइमलाइन
- 15 अक्टूबर 2019: समीर लापता
- 16 अक्टूबर 2019: गुमशुदगी और अपहरण का मुकदमा दर्ज
- 19 अक्टूबर 2019: शव बरामद
- 30 जनवरी 2020: आरोपपत्र पर संज्ञान
- 4 अप्रैल 2026: दोष सिद्ध
- 6 अप्रैल 2026: सजा सुनाई गई
फैसले में भावनात्मक टिप्पणी
अदालत ने अपने फैसले में एक भावुक टिप्पणी भी दर्ज की, जिसमें न्याय व्यवस्था और अधिवक्ता की भूमिका को दर्शाते हुए कहा गया कि सच की लड़ाई लड़ने वाला ही साजिश का शिकार हो गया, लेकिन न्याय अंततः विजयी होगा।
फैसले में लिखी गई यह कविता….
”कचहरी की सीढ़ियों पर,
आज सन्नाटा कुछ बोल रहा है,
जहां दलीलों की गूंज थी कल,
वहां खामोशी डोल रही है,
काला कोट जो ढाल बना था,
सच की हर एक लड़ाई में,
वो गिर पड़ा आज जमीन पर,
झूठ की गहरी साजिश में,
कल तक जो कानून था जिंदा,
हर जुर्म को आईना दिखाता था,
आज उसी के रखवाले को,
किसी ने बेरहमी से सुला डाला,
पर ये खून बेकार नहीं जायेगा,”
