वाराणसी (रणभेरी): काशी का प्रसिद्ध महामूर्ख मेला इस साल 58वें वर्ष में प्रवेश कर गया। इस वार्षिक उत्सव में केवल हास्य और कविताओं का ही नहीं, बल्कि सामाजिक और वैश्विक मुद्दों की व्यंग्यपूर्ण झलक भी देखने को मिलेगी। इस वर्ष का सम्मेलन अमेरिका-ईरान संघर्ष और तेल-सिलिंडर संकट जैसे विषयों पर भी प्रकाश डालेगा। मंच का उद्घाटन हमेशा की तरह गदहे की विशिष्ट ध्वनि से होगा। जैसे ही घाट पर चीपो-चीपो की आवाज़ गूंजती है, दर्शकों की हंसी ठहाकों में बदल जाती है और पूरा माहौल उल्लास से भर जाता है।
बेमेल विवाह की परंपरा
महामूर्ख मेला अपनी बेमेल विवाह की परंपरा के लिए भी जाना जाता है। इस उत्सव में पुरुष दुल्हन और महिला दूल्हा बनकर विवाह समारोह का हिस्सा बनती हैं। यह रंगारंग आयोजन हमेशा दर्शकों के बीच हँसी और मनोरंजन का केंद्र रहा है।
स्थल और इतिहास
इस मेले का पहला आयोजन चौक थाने के सामने भद्दोमल के छत से हुआ था। इसके पहले उद्घाटन कवियों में धर्मशील चतुर्वेदी, भइयाजी बनारसी, चकाचक बनारसी और सांड बनारसी जैसे नाम शामिल थे। बाद में यह आयोजन गंगा पार के डॉ. राजेंद्र प्रसाद घाट पर स्थायी रूप से आयोजित होने लगा।
अप्रैल फूल डे का व्यंग्य
इस सम्मेलन की नींव अंग्रेजों द्वारा भारत में मनाए जाने वाले अप्रैल फूल डे के विरोध में रखी गई थी। डॉ. रमेशदत्त पांडेय के अनुसार, काशी के विद्वानों ने इसे हास्य और व्यंग्य के माध्यम से सामाजिक चेतना फैलाने का माध्यम बनाया। तभी से यह मंच साहित्य, कला और जनजागरण का एक विशेष केंद्र बन गया।
इस साल के कलाकार
इस वर्ष के मेले में शाम सात बजे से कई प्रमुख कवि और हास्य कलाकार मंच पर अपने हास्य-व्यंग्य का प्रदर्शन करेंगे। इनमें सरदार प्रताप फौजदार, अकबर ताज (खंडवा), कामता माखन (रीवा), धर्मराज उपाध्याय (लखनऊ), विकास बौखल (बाराबंकी), जगजीवन मिश्रा (मिर्जापुर), सलीम शिवालवी (वाराणसी), प्रशांत बजरंगी और प्रशांत सिंह शामिल हैं।
बेमेल विवाह में पारंपरिक बंगाली मौर पहनाई जाएगी। इसके साथ ही बनारसी नगाड़े की थाप पर नृत्य और छह महिला कलाकारों द्वारा मोहिनी नृत्य प्रस्तुत किया जाएगा। उत्सव में अनुमानित 10,000 से अधिक लोग शामिल होंगे और यह मेला काशी की हास्य और लोकसंस्कृति का अनोखा प्रतिबिंब पेश करेगा।
